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Atharvaveda / 20 / 47 / 20

स॒प्त त्वा॑ ह॒रितो॒ रथे॒ वह॑न्ति देव सूर्य। शो॒चिष्के॑शं विचक्ष॒णम् ॥ 20॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 47 | Paryay : | Mantra No : 20

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः | देवता : सूर्यः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : १३-२१। परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदपाठ : स॒प्त । त्वा॒ । ह॒रित॑: । रथे॑ । वह॑न्ति । दे॒व॒ । सू॒र्य॒ ॥ शो॒चि:ऽके॑शम् । वि॒ऽच॒क्ष॒णम् ॥४७.२०॥

पदार्थ : (देव) हे चलनेवाले (सूर्य) सूर्य ! [रविमण्डल] (सप्त) सात [शुक्ल, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश, चित्र वर्ण वाली] (हरितः) आकर्षक किरणें (शोचिष्केशम्) पवित्र प्रकाशवाले (विचक्षणम्) विविध प्रकार दिखानेवाले (त्वा) तुझको (रथ) रथ [गमन विधान] में (वहन्ति) ले चलती हैं ॥२०॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१३-२१−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० १३।२।१६-२४ ॥