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Atharvaveda / 20 / 49 / 5

द्यु॒क्षं सु॒दानुं॒ तवि॑षीभि॒रावृ॑तं गि॒रिं न पु॑रु॒भोज॑सम्। क्षु॒मन्तं॒ वाजं॑ श॒तिनं॑ सह॒स्रिणं॑ म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे ॥ 5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 49 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : नोधाः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः | स्वर :

विषय : ईश्वर की उपासना का उपदेश।

पदपाठ : द्यु॒क्षम् । सु॒ऽदानु॑म् । तावि॑षीभि: । आऽवृ॑तम् । गि॒रिम् । न । पु॒रु॒ऽभोज॑सम् ॥ क्षु॒ऽमन्त॑म् । वाज॑म् । श॒तिन॑म् । स॒ह॒स्रिण॑म् । म॒क्षु॒ । गोऽम॑न्तम् । ई॒म॒हे॒ ॥४९.५॥

पदार्थ : (द्युक्षम्) व्यवहारों में गतिवाले, (सुदानुम्) बड़े दानी, (तविषीभिः) सेनाओं से (आवृतम्) भरपूर, (गिरिम् न) मेघ के समान (पुरुभोजसम्) बहुत पालन करनेवाले (क्षुमन्तम्) अन्नवाले, (वाजम्) बलवाले, (शतिनम्) सैकड़ों उत्तम पदार्थोंवाले, (सहस्रिणम्) सहस्रों श्रेष्ठ गुणवाले, (गोमन्तम्) उत्तम गौओंवाले [शूर पुरुष] को (मक्षु) शीघ्र [इन्द्र परमात्मा से] (ईमहे) हम माँगते हैं ॥॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४-७−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० २०।९।१-४ ॥