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Atharvaveda / 20 / 57 / 16

कण्वे॑भिर्धृष्ण॒वा धृ॒षद्वाजं॑ दर्षि सह॒स्रिण॑म्। पि॒शङ्ग॑रूपं मघवन्विचर्षणे म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे ॥16॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 57 | Paryay : | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : मेध्यातिथिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर :

विषय : मन्त्र १४-१६ परमात्मा की उपासना का उपदेश।

पदपाठ : क॒ण्वे॑भि: । धृ॒ष्णो॒ इति॑ । आ । धृ॒षत् । वाज॑म् । द॒र्षि॒ । स॒ह॒स्रिण॑म् ॥ पि॒शङ्ग॑ऽरूपम् । म॒घ॒ऽव॒न् । वि॒ऽच॒र्ष॒णे॒ । म॒क्षू । गोम॑न्तम् । ई॒म॒हे॒ ॥५७.१६॥

पदार्थ : (धृष्णो) हे निर्भय ! [परमात्मन्] (धृषत्) दृढ़ता से (कण्वेभिः) बुद्धिमानों करके [किये हुए] (सहस्रिणम्) सहस्रों आनन्दवाले (वाजम्) वेग का (आ दर्षि) तू आदर करता है, (मघवन्) हे धनवाले ! (विचर्षणे) हे दूरदर्शी ! (पिशङ्गरूपम्) अवयवों को रूप देनेवाले, (गोमन्तम्) वेदवाणीवाले [तुझ] से (मक्षु) शीघ्र (ईमहे) हम प्रार्थना करते हैं ॥१६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१४-१६। एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० २०।३।१-३ ॥