Atharvaveda / 20 / 78 / 2
न घा॒ वसु॒र्नि य॑मते दा॒नं वाज॑स्य॒ गोम॑तः। यत्सी॒मुप॒ श्रव॒द्गिरः॑ ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 78 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : sha.myuH | Devta : indraH | Metre : chatuShpadaa puro.atishakvarii jagatii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : na ghaa vasurni yamate daana.m vaajasya gomataH. yatsiimupa shravadgiraH . 2.
Component Words : na . cha . vasuH . ni . yamate . daanam . vaajasya . go.amataH . yat . siim . upa . shravat . giraH .78.2.
In Hindi:
ऋषि : शंयुः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :
विषय : राजा और प्रजा के वर्ताव का उपदेश ॥
पदपाठ : न । च॒ । वसु॑: । नि । य॒म॒ते॒ । दा॒नम् । वाज॑स्य । गोऽम॑त: ॥ यत् । सी॒म् । उप॑ । श्रव॑त् । गिर॑: ॥७८.२॥
पदार्थ : (वसुः) बसानेवाला राजा (गोमतः) उत्तम विद्या से युक्त (वाजस्य) बल के (दानम्) दान को (न घ) कभी नहीं (नि यमते) रोके, (यत्) जब कि वह (गिरः) हमारी वाणियों को (सीम्) सब प्रकार (उप श्रवत्) सुन लेवे ॥२॥"
भावार्थ : टिप्पणी :२−(न) निषेधे (घ) एव (वसुः) वासयिता (नि) नितराम् (यमते) यमु उपरमे। उपरतं निरुद्धं कुर्यात् (दानम्) (वाजस्य) बलस्य (गोमतः) प्रशस्तविद्यायुक्तस्य (यत्) यदा (सीम्) सर्वतः (उप) समीपे (श्रवत्) शृणुयात् (गिरः) वाणीः ॥