Atharvaveda / 20 / 107 / 12
ए॒वा म॒हान्बृ॒हद्दि॑वो॒ अथ॒र्वावो॑च॒त्स्वां त॒न्व१॒॑मिन्द्र॑मे॒व। स्वसा॑रौ मात॒रिभ्व॑री अरि॒प्रे हि॒न्वन्ति॑ चैने॒ शव॑सा व॒र्धय॑न्ति च ॥ 12॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 107 | Paryay : | Mantra No : 12
In English:
Seer : bRRihaddivo.atharvaa | Devta : indraH | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : evaa mahaanbRRihaddivo atharvaavochatsvaa.m tanva1mindrameva. svasaarau maataribhvarii aripre hinvanti chaine shavasaa vardhayanti cha . 12.
Component Words : eva . mahaan . bRRihat.adivaH . atharvaa . avochat . svaam . tanvam . indram . eva . svasaarau . maataribhvarii iti . aripre iti . hinvanti . cha . ene iti . shavasaa . vardhayanti . cha .107.12.
In Hindi:
ऋषि : बृहद्दिवोऽथर्वा | देवता : इन्द्रः | छन्द : भुरिक्परातिजागतात्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : १-१२ परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : ए॒व । म॒हान् । बृ॒हत्ऽदि॑व: । अथ॑र्वा । अवो॑चत् । स्वाम् । त॒न्व॑म् । इन्द्र॑म् । ए॒व ॥ स्वसा॑रौ । मा॒त॒रिभ्व॑री॒ इति॑ । अ॒रि॒प्रे इति॑ । हि॒न्वन्ति॑ । च॒ । ए॒ने॒ इति॑ । शव॑सा । व॒र्धय॑न्ति । च॒ ॥१०७.१२॥
पदार्थ : (महान्) महान्, (बृहद्दिवः) बड़े व्यवहारवाले, (अथर्वा) निश्चलस्वभाव पुरुष ने (स्वाम्) अपनी (तन्वम्) विस्तृत स्तुति (इन्द्रम्) परमेश्वर के लिये (एव) ही (एव) इस प्रकार से (अवोचत्) कही है। (मातरिभ्वरी) आकाश में वर्तमान (स्वसारौ) अच्छे प्रकार ग्रहण करनेवाले वा गतिवाले [वा दो बहिनों के समान सहायकारी] दिन और रात (च) और (अरिप्रे) निर्दोष (एने) यह दोनों [सूर्य और पृथिवी] (शवसा) अपने सामर्थ्य से [उसी को] (हिन्वन्ति) प्रसन्न करती (च) और (वर्धयन्ति) सराहती हैं ॥१२॥"
भावार्थ : टिप्पणी :४-१२−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अथ० ।२।१-९ ॥