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Atharvaveda / 20 / 110 / 2

यस्मि॒न्विश्वा॒ अधि॒ श्रियो॒ रण॑न्ति स॒प्त सं॒सदः॑। इन्द्रं॑ सु॒ते ह॑वामहे ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 110 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : श्रुतकक्षः सुकक्षो वा | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : विद्वानों के कर्तव्य का उपदेश।

पदपाठ : यस्मि॑न् । विश्वा॑: । अधि॑ । श्रिय॑: । रण॑न्ति । स॒प्त । स॒म्ऽसद॑: ॥ इन्द्र॑म् । सु॒ते । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥११०.२॥

पदार्थ : (यस्मिन्) जिस [पुरुष] में (सप्त) सात (संसदः) मिलकर बैठनेवाले [अर्थात् त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, वाक्, मन और बुद्धि] (विश्वाः) सब (श्रियः) सम्पत्तियों को (अधि) अधिकारपूर्वक (रणन्ति) पाते हैं, (इन्द्रम्) उस इन्द्र [महाप्रतापी मनुष्य] को (सुते) सिद्ध किये तत्त्वरस में (हवामहे) हम बुलाते हैं ॥२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :यजुर्वेद ३४।। में आया है−(सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे) सात ऋषि [अर्थात् त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, वाक्, मन और बुद्धि] शरीर में रक्खे हुए हैं ॥ २−(यस्मिन्) इन्द्रे (विश्वाः) सर्वाः (अधि) अधिकृत्य (श्रियः) सम्पत्तीः (रणन्ति) गच्छन्ति। प्राप्नुवन्ति (सप्त) सप्तसंख्याकाः (संसदः) परस्परस्थितिशीलाः−त्वचानेत्रश्रोत्रजिह्वावाङ्मनोबुद्धयः (इन्द्रम्) तं महाप्रतापिनं मनुष्यम् (सुते) निष्पादिते तत्त्वरसे (हवामहे) आह्वयामः ॥