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Atharvaveda / 20 / 129 / 10

शृङ्गं॑ ध॒मन्त॑ आसते ॥ 10॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 129 | Paryay : | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : | देवता : प्रजापतिः | छन्द : प्राजापत्या गायत्री | स्वर :

विषय : मनुष्य के लिये प्रयत्न का उपदेश।

पदपाठ : शृङ्ग॑म् । ध॒मन्त॑: । आसते ॥१२९.१०॥

पदार्थ : [वहाँ] (त्रयः) तीन [आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक क्लेश रूप] (पृदाकवः) अजगर [बड़े साँप] (शृङ्गम्) (धमन्तः) सींग फूँकते हुए [बाजे के समान फुफकार मारते हुए] (परि) अलग (आसते) बैठते हैं ॥८-१०॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१०−(शृङ्गम्) वाद्यविशेषं यथा, तथा श्वासशब्दम् (घञन्तः) ध्मा शब्दाग्निसंयोगयोः-शतृ। दीर्घश्वासेन शब्दयन्तः (आसते) उपविशन्ति ॥