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Atharvaveda / 20 / 134 / 5

इ॒हेत्थ प्रागपा॒गुद॑ग॒धरा॒गास्ते॑ लाहणि॒ लीशा॑थी ॥ 5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 134 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : | देवता : प्रजापतिः | छन्द : निचृत्साम्नी पङ्क्तिः | स्वर :

विषय : बुद्धि बढ़ाने का उपदेश।

पदपाठ : इ॒ह । इत्थ॑ । प्राक् । अपा॒क् । उद॑क् । अ॒ध॒राक् । आष्टे॑ । लाहणि॒ । लीशा॑थी ॥१३४.५॥

पदार्थ : (इह) यहाँ (इत्थ) इस प्रकार (प्राक्) पूर्व में, (अपाक्) पश्चिम में, (उदक्) उत्तर में और (अधराक्) दक्षिण में − (लाहणि) प्रेरक बुद्धि (लीशाथी) चलती हुई (आष्टे) फैलती हुई ॥॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :−(आष्टे) अशू व्याप्तौ। व्याप्यते (लाहणि) अर्त्तिसृधृ०। उ० २।१०२। लाभ प्रेरणे−अनि, भस्य हः। विभक्तेर्लुक्। प्रेरिका शक्तिः। तीक्ष्णा बुद्धिः (लीशाथी) रुवदिभ्यां डित्। उ० ३।११। लिश गतौ, अल्पीभावे च−अथ प्रत्ययः, ङीप्, पृषोदरादिरूपम्। गमनशीला सती ॥