Atharvaveda / 20 / 141 / 4
आ नू॒नं या॑तमश्विने॒मा ह॒व्यानि॑ वां हि॒ता। इ॒मे सोमा॑सो॒ अधि॑ तु॒र्वशे॒ यदा॑वि॒मे कण्वे॑षु वा॒मथ॑ ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 141 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : shashakarNaH | Devta : ashvinau | Metre : bRRihatiigarbhaanuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : aa nuuna.m yaatamashvinemaa havyaani vaa.m hitaa. ime somaaso adhi turvashe yadaavime kaNveShu vaamatha . 4.
Component Words : aa . nuunam . yaatam . ashvinaa . imaa . havyaani . vaam . hitaa . ime . somaasaH . adhi . turvashe . yadau . ime . kaNveShu . vaam . atha .141.4.
In Hindi:
ऋषि : शशकर्णः | देवता : अश्विनौ | छन्द : बृहती | स्वर :
विषय : दिन और राति के उत्तम प्रयोग का उपदेश।
पदपाठ : आ । नू॒नम् । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । इ॒मा । ह॒व्यानि॑ । वा॒म् । हि॒ता ॥ इ॒मे । सोमा॑स: । अधि॑ । तु॒र्वशे॑ । यदौ॑ । इ॒मे । कण्वे॑षु । वा॒म् । अथ॑ ॥१४१.४॥
पदार्थ : (अश्विना) हे दोनों अश्वी ! [व्यापक दिन-रात] (नूनम्) अवश्य (आ यातम्) आओ, (इमा) यह (हव्यानि) ग्राह्य द्रव्य (वाम्) तुम दोनों के लिये (हिता) रक्खे हैं। (इमे) यह (सोमासः) सोम रस [तत्त्व रस] (तुर्वशे) हिंसकों को वश में करनेवाले, (यदौ) यत्नशील मनुष्य में (अथ) और (इमे) यह [तत्त्व रस] (कण्वेषु) बुद्धिमानों में (वाम्) तुम दोनों के (अधि) अधिकाई से हैं ॥४॥"
भावार्थ : टिप्पणी :४−(आ यातम्) आगच्छतम् (नूनम्) अवश्यम् (अश्विना) म० २। हे व्यापकौ अहोरात्रौ (इमा) पुरोवर्तीनि (हव्यानि) ग्राह्यवस्तूनि (वाम्) युवाभ्याम् (हिता) धृतानि (इमे) दृश्यमानाः (सोमासः) तत्त्वरसाः (अधि) आधिक्येन (तुर्वशे) अ० २०।३७।८। नरां हिंसकानां वशयितरि (यदौ) यती प्रयत्ने-उप्रत्ययः, तकारस्य दः। प्रयत्नशीले (इमे) (कण्वेषु) मेधाविषु (वाम्) युवयोः (अथ) अपि च ॥