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Rigveda / 1 / 91 / 17

आ प्या॑यस्व मदिन्तम॒ सोम॒ विश्वे॑भिरं॒शुभि॑:। भवा॑ नः सु॒श्रव॑स्तम॒: सखा॑ वृ॒धे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 91 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : सोमः | छन्द : परोष्निक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

पदपाठ : आ। प्या॒य॒स्व॒। म॒दि॒न्ऽत॒म॒। सोम॑। विश्वे॑भिः। अं॒शुऽभिः॑। भव॑। नः॒। सु॒श्रवः॑ऽतमः। सखा॑। वृ॒धे ॥ १.९१.१७

पदार्थ : हे (मदिन्तम) अत्यन्त प्रशंसित आनन्दयुक्त (सोम) विद्या और ऐश्वर्य के देनेवाले ! जो (सुश्रवस्तमः) बहुश्रुत वा अच्छे अन्नादि पदार्थों से युक्त (सखा) आप मित्र हैं सो (नः) हम लोगों के (वृधे) उन्नति के लिये (भव) हूजिये और (विश्वेभिः) समस्त (अंशुभिः) सृष्टि के सिद्धान्तभागों [=तत्त्वावयवों] से (आ) अच्छे प्रकार (प्यायस्व) वृद्धि को प्राप्त हूजिये ॥ १७ ॥

भावार्थ : जो उत्तम विद्वान् समस्त उत्तम ओषधिगण से सृष्टिक्रम की विद्याओं में मनुष्यों की उन्नति करता है, उसके अनुकूल सबको चलना चाहिये ॥ १७ ॥