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Rigveda / 1 / 92 / 2

उद॑पप्तन्नरु॒णा भा॒नवो॒ वृथा॑ स्वा॒युजो॒ अरु॑षी॒र्गा अ॑युक्षत। अक्र॑न्नु॒षासो॑ व॒युना॑नि पू॒र्वथा॒ रुश॑न्तं भा॒नुमरु॑षीरशिश्रयुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 92 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : उषाः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वे प्रातःकाल की वेला कैसी हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : उत्। अ॒प॒प्त॒न्। अ॒रु॒णाः। भा॒नवः॑। वृथा॑। सु॒ऽआ॒युजः॑। अरु॑षीः। गाः। अ॒यु॒क्ष॒त॒। अक्र॑न्। उ॒षसः॑। व॒युना॑नि। पू॒र्वथा॑। रुश॑न्तम्। भा॒नुम्। अरु॑षीः। अ॒शि॒श्र॒युः॒ ॥ १.९२.२

पदार्थ : हे विद्वानो ! जो (अरुणाः) रक्तगुणवाली (स्वायुजः) और अच्छे प्रकार सब पदार्थों से युक्त होती हैं वे (उषसः) प्रातःकालीन सूर्य की (भानवः) किरणें (वृथा) मिथ्या सी (उत्) ऊपर (अपप्तन्) पड़ती हैं अर्थात् उसमें ताप न्यून होता है, इससे शीतल सी होती हैं और उनसे (गाः) पृथिवी आदि लोक (अरुषीः) रक्तगुणों से (अयुक्षत) युक्त होते हैं। जो (अरुषीः) रक्तगुणवाली सूर्य की उक्त किरणें (वयुनानि) सब पदार्थों का विशेष ज्ञान वा सब कामों को (अक्रन्) कराती हैं वे (पूर्वथा) पिछले-पिछले (रुशन्तम्) अन्धकार के छेदक (भानुम्) सूर्य के समान अलग-अलग दिन करनेवाले सूर्य का (अशिश्रयुः) सेवन करती हैं, उनका सेवन युक्ति से करना चाहिये ॥ २ ॥

भावार्थ : जो सूर्य की किरणें भूगोल आदि लोकों का सेवन अर्थात् उनपर पड़ती हुई क्रम-क्रम से चलती जाती हैं, वे प्रातः और सायङ्काल के समय भूमि के संयोग से लाल होकर बादलों को लाल कर देती हैं और जब ये प्रातःकाल लोकों में प्रवृत्त अर्थात् उदय को प्राप्त होती हैं तब प्राणियों को सब पदार्थों के विशेष ज्ञान होते हैं। जो भूमि पर गिरी हुई लाल वर्ण की हैं वे सूर्य के आश्रय होकर और उसको लाल कर ओषधियों का सेवन करती हैं, उनका सेवन जागरितावस्था में मनुष्यों को करना चाहिये ॥ २ ॥