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Rigveda / 1 / 92 / 14

उषो॑ अ॒द्येह गो॑म॒त्यश्वा॑वति विभावरि। रे॒वद॒स्मे व्यु॑च्छ सूनृतावति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 92 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : उषाः | छन्द : विराट्परोष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर वह क्या करती है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

पदपाठ : उषः॑। अ॒द्य। इ॒ह। गो॒ऽम॒ति॒। अश्व॑ऽवति। वि॒भा॒ऽव॒रि॒। रे॒वत्। अ॒स्मे। वि। उ॒च्छ॒। सू॒नृ॒ता॒ऽव॒ति॒ ॥ १.९२.१४

पदार्थ : हे स्त्री ! जैसे (गोमति) जिसके सम्बन्ध में गौ होतीं (अश्वावति) घोड़े होते तथा (सूनृतावति) जिसके प्रशंसनीय काम हैं, वह (विभावरि) क्षण-क्षण बढ़ती हुई दीप्तिवाली (उषः) प्रातःसमय की वेला (अस्मे) हम लोगों के लिये (रेवत्) जिसमें प्रशंसित धन हों उस सुख को (वि, उच्छ) प्राप्त कराती है, उससे हम लोग (अद्य) आज (इह) इस जगत् में सुखों को (धामहे) धारण करते हैं ॥ १४ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में (धामहे) इस पद की अनुवृत्ति आती है, मनुष्यों को चाहिये कि प्रतिदिन प्रातःकाल सोने से उठकर जबतक फिर न सोवें तबतक अर्थात् दिनभर निरालसता से उत्तम यत्न के साथ विद्या, धन और राज्य तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन सब उत्तम-उत्तम पदार्थों को सिद्ध करें ॥ १४ ॥