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Rigveda / 1 / 94 / 2

यस्मै॒ त्वमा॒यज॑से॒ स सा॑धत्यन॒र्वा क्षे॑ति॒ दध॑ते सु॒वीर्य॑म्। स तू॑ताव॒ नैन॑मश्नोत्यंह॒तिरग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 94 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : कुत्सः आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : यस्मै॑। त्वम्। आ॒ऽयज॑से। सः। सा॒ध॒ति॒। अ॒न॒र्वा। क्षे॒ति॒। दध॑ते। सु॒ऽवीर्य॑म्। सः। तू॒ता॒व॒। न। ए॒न॒म्। अ॒श्नो॒ति॒। अं॒ह॒तिः। अग्ने॑। स॒ख्ये। मा। रि॒षा॒म॒। व॒यम्। तव॑ ॥ १.९४.२

पदार्थ : हे (अग्ने) सब विद्या के विशेष जनानेवाले विद्वान् ! (अनर्वा) विना घोड़ों के अग्न्यादिकों से चलाये हुए विमान आदि यान के समान (त्वम्) आप (यस्मै) जिस (आयजसे) सर्वथा सुख को देनेहारे जीव के लिये रक्षा को (साधति) सिद्ध करते हो (सः) वह (सुवीर्य्यम्) जिन मित्रों के काम में अच्छे-अच्छे पराक्रम हैं, उनको (दधते) धारण करता और वह (तूताव) उस को बढ़ाता भी है, (एनम्) इस उत्तम गुणयुक्त पुरुष को (अंहतिः) दरिद्रता (न, अश्नोति) नहीं प्राप्त होती, (सः) वह (क्षेति) सुख में रहता है, ऐसे (तव) आपके (सख्ये) मित्रपन में (वयम्) हम लोग (मा, रिषाम) दुःखी न हों ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वानों की सभा वा अग्निविद्या में मित्रपन प्रसिद्ध करते हैं, वे पूरे शरीर तथा आत्मा के बल को पाकर सुखयुक्त रहते हैं, अन्य नहीं ॥ २ ॥