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Rigveda / 1 / 94 / 5

वि॒शां गो॒पा अ॑स्य चरन्ति ज॒न्तवो॑ द्वि॒पच्च॒ यदु॒त चतु॑ष्पद॒क्तुभि॑:। चि॒त्रः प्र॑के॒त उ॒षसो॑ म॒हाँ अ॒स्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 94 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : कुत्सः आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब ईश्वर और सभाध्यक्ष के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में करते हैं ।

पदपाठ : वि॒शाम्। गो॒पाः। अ॒स्य॒। च॒र॒न्ति॒। ज॒न्तवः॑। द्वि॒ऽपत्। च॒। यत्। उ॒त। चतुः॑ऽपत्। अ॒क्तुऽभिः॑। चि॒त्रः। प्र॒ऽके॒तः। उ॒षसः॑। म॒हान्। अ॒सि॒। अग्ने॑। स॒ख्ये। मा। रि॒षा॒म॒। व॒यम्। तव॑ ॥ १.९४.५

पदार्थ : हे (अग्ने) उत्तम सुखों के समझानेवाले सभा आदि कामों के अध्यक्ष ! आपके राज्य में वा उत्तम सुखों का विज्ञान करानेवाले (अस्य) इस जगदीश्वर की सृष्टि में (विशाम्) प्रजाजनों के (यत्) जो (गोपाः) पालनेहारे गुण वा (जन्तवः) मनुष्य (चरन्ति) विचरते हैं वा (अक्तुभिः) प्रसिद्ध कर्म, प्रसिद्ध मार्ग और प्रसिद्ध रात्रियों के साथ (उषसः) दिनों को प्राप्त होते हैं वा जो (द्विपत्) दो पगवाले जीव (च) वा पगहीन सर्प आदि (उत) और (चतुष्पत्) चौपाये पशु आदि विचरते हैं तथा जो (चित्रः) अद्भुत गुणकर्मस्वभाववान् (प्रकेतः) सब वस्तुओं को जनाते हुए जगदीश्वर वा सभाध्यक्ष आप (महान्) उत्तमोत्तम (असि) हैं, उन (तव) आपके (सख्ये) मित्रपन में (वयम्) हम लोग (मा, रिषाम) बेमन कभी न हों ॥ ५ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिस जगदीश्वर वा सभाध्यक्ष विद्वान् के बड़प्पन से जगत् की उत्पत्ति, पालना और भङ्ग होते हैं, उसके मित्रपन वा मित्र के काम में कभी विघ्न न करें ॥ ५ ॥