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Rigveda / 1 / 94 / 14

तत्ते॑ भ॒द्रं यत्समि॑द्ध॒: स्वे दमे॒ सोमा॑हुतो॒ जर॑से मृळ॒यत्त॑मः। दधा॑सि॒ रत्नं॒ द्रवि॑णं च दा॒शुषेऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 94 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : कुत्सः आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर कैसों के साथ सबको प्रेमभाव करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : तत्। ते॒। भ॒द्रम्। यत्। सम्ऽइ॑द्धः। स्वे। दमे॑। सोम॑ऽआहुतः। जर॑से। मृ॒ळ॒यत्ऽत॑मः। दधा॑सि। रत्न॑म्। द्रवि॑णम्। च॒। दा॒शुषे॑। अग्ने॑। स॒ख्ये। मा। रि॒षा॒म॒। व॒यम्। तव॑ ॥ १.९४.१४

पदार्थ : हे (अग्ने) समस्त विज्ञान देनेवाले ईश्वर वा विद्वन् ! (यत्) जिस कारण (स्वे) अपने (दमे) दमन किये हुए संसार में (समिद्धः) अच्छे प्रकार प्रकाशित (सोमाहुतः) और ऐश्वर्य्य करनेवाले गुण और पदार्थों से वृद्धि को प्राप्त किये हुए अग्नि के समान (मृडयत्तमः) अत्यन्त सुख देनेहारे आप सब विद्वानों से (जरसे) अर्चन पूजन को प्राप्त होते हैं वा (दाशुषे) उत्तम शील के निमित्त अपना वर्त्ताव वर्त्तते हुए मनुष्य के लिये (रत्नम्) अति रमणीय (द्रविणम्) चक्रवर्त्ति राज्य आदि कामों से सिद्ध धन (च) और विद्या आदि अच्छे गुणों को (दधासि) धारण करते हैं (तत्) इस कारण ऐसे (ते) आपके (भद्रम्) सुख करनेवाले स्वभाव को (वयम्) हम लोग कभी (मा, रिषाम) मत भूलें किन्तु (तव) आपके (सख्ये) मित्रपन में अच्छे प्रकार स्थिर हों ॥ १४ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि वेदप्रमाण और संसार के बार-बार होने न होने आदि व्यवहार के प्रमाण तथा सत्यपुरुषों के वाक्यों से वा ईश्वर और विद्वान् के काम वा स्वभाव को जी में धर सब प्राणियों के साथ मित्रता वर्त्तकर सब दिन विद्या, धर्म की शिक्षा की उन्नति करें ॥ १४ ॥