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Rigveda / 1 / 95 / 4

क इ॒मं वो॑ नि॒ण्यमा चि॑केत व॒त्सो मा॒तॄर्ज॑नयत स्व॒धाभि॑:। ब॒ह्वी॒नां गर्भो॑ अ॒पसा॑मु॒पस्था॑न्म॒हान्क॒विर्निश्च॑रति स्व॒धावा॑न् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 95 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : कुत्सः आङ्गिरसः | देवता : सत्यगुणविशिष्टोऽग्निः शुद्धोऽग्निर्वा | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह दिन-रात्रि के समय का समूह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : कः। इ॒मम्। वः॒। नि॒ण्यम्। आ। चि॒के॒त॒। व॒त्सः। मा॒तॄः। ज॒न॒य॒त॒। स्व॒ऽधाभिः॑। ब॒ह्वी॒नाम्। गर्भः॑। अ॒पसा॑म्। उ॒पऽस्था॑त्। म॒हान्। क॒विः। निः। च॒र॒ति॒। स्व॒धाऽवा॑न् ॥ १.९५.४

पदार्थ : जो (बह्वीनाम्) अनेकों अन्तरिक्ष और भूमि तथा दिशाओं वा जलों के (उपस्थात्) समीपस्थ व्यवहार से (गर्भः) अच्छा आच्छादन करनेवाला (स्वधावान्) जिसके कि प्रशंसित अपने अङ्ग विद्यमान हैं (महान्) व्याप्ति आदि गुणों से युक्त (वत्सः) किन्तु अपनी व्याप्ति से सर्वोपरि सबको ढांपने वा (कविः) क्रम-क्रम से दृष्टिगत होनेवाला समय (निः) (चरति) निरन्तर अर्थात् एकतार चल रहा है और (स्वधाभिः) सूर्य्य वा भूमि के साथ (मातॄः) माता के तुल्य पालनेहारी रात्रियों को (जनयत) प्रकट करता है (इमम्) इस (निण्यम्) निश्चय से एक से रहनेवाले समय को (कः) कौन मनुष्य (आ, चिकेत) अच्छे प्रकार जान सके (वः) इन समय के अवयवों अर्थात् क्षण, घड़ी, प्रहर, दिन, रात, मास, वर्ष आदि के स्वरूप को भी कौन जान सके ॥ ४ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को जानना चाहिये कि जिसका सूक्ष्म से सूक्ष्म बोध है, जो समस्त अपने अवयवों को प्रकट करता, सब कामों में व्याप्त होता, जिसमें सब जगत् एक रस रहता है उस समय को कोई विद्वान् जान-सकता है, सब कोई नहीं ॥ ४ ॥