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Rigveda / 1 / 95 / 10

धन्व॒न्त्स्रोत॑: कृणुते गा॒तुमू॒र्मिं शु॒क्रैरू॒र्मिभि॑र॒भि न॑क्षति॒ क्षाम्। विश्वा॒ सना॑नि ज॒ठरे॑षु धत्ते॒ऽन्तर्नवा॑सु चरति प्र॒सूषु॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 95 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : कुत्सः आङ्गिरसः | देवता : सत्यगुणविशिष्टोऽग्निः शुद्धोऽग्निर्वा | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब समय वा अग्नि किस प्रकार का है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : धन्व॑न्। स्रोतः॑। कृ॒णु॒ते॒। गा॒तुम्। ऊ॒र्मिम्। शु॒क्रैः। ऊ॒र्मिऽभिः॑। अ॒भि। न॒क्ष॒ति॒। क्षाम्। विश्वा॑। सना॑नि। ज॒ठरे॑षु। ध॒त्ते॒। अ॒न्तः। नवा॑सु। च॒र॒ति॒। प्र॒ऽसूषु॑ ॥ १.९५.१०

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो समय वा बिजुलीरूप आग (धन्वन्) अन्तरिक्ष में (स्रोतः) जिससे और-और वस्तु वा जल प्राप्त होते हैं उस (गातुम्) प्राप्त होने योग्य (ऊर्मिम्) प्रातःसमय की वेला वा जल की तरङ्ग को (कृणुते) प्रकट करता है वा (शुक्रैः) शुद्ध क्रम वा किरणों और (ऊर्मिभिः) पदार्थ प्राप्त कराने हारे तरङ्गों से (क्षाम्) भूमि को भी (अभि, नक्षति) सब ओर से व्याप्त और प्राप्त होता है वा जो (जठरेषु) भीतरले व्यवहारों और पेट के भीतर अन्न आदि पचाने के स्थानों में (विश्वा) समस्त (सनानि) न्यारे-न्यारे पदार्थों को (धत्ते) स्थापित करता वा जो (प्रसूषु) पदार्थ उत्पन्न होते हैं उनमें वा (नवासु) नवीन प्रजाजनों में (अन्तः) भीतर (चरति) विचरता है, उसको यथावत् जानो ॥ १० ॥

भावार्थ : आप्त विद्वान् मनुष्यों को चाहिये कि व्यापनशील काल और बिजुलीरूप अग्नि को जानकर उनके निमित्त से अनेक कामों को यथावत् सिद्ध करें ॥ १० ॥