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Rigveda / 1 / 100 / 6

स म॑न्यु॒मीः स॒मद॑नस्य क॒र्तास्माके॑भि॒र्नृभि॒: सूर्यं॑ सनत्। अ॒स्मिन्नह॒न्त्सत्प॑तिः पुरुहू॒तो म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 100 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वृषागिरो महाराजस्य पुत्रभूता वार्षागिरा ऋज्राश्वाम्बरीषसहदेवभयमानसुराधसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : सः। म॒न्यु॒ऽमीः। स॒ऽमद॑नस्य। क॒र्ता। अ॒स्माके॑भिः। नृऽभिः॑। सूर्य॑म्। स॒न॒त्। अ॒स्मिन्। अह॑न्। सत्ऽप॑तिः। पु॒रु॒ऽहू॒तः। म॒रुत्वा॑न्। नः॒। भ॒व॒तु॒। इन्द्रः॑। ऊ॒ती ॥ १.१००.६

पदार्थ : जो (मन्युमीः) क्रोध का मारने वा (समदनस्य) जिसमें आनन्द है उसका (कर्त्ता) करने और (सत्पतिः) सज्जन तथा उत्तम कामों को पालनेहारा (पुरुहूतः) वा बहुत विद्वान् और शूरवीरों ने जिसकी स्तुति और प्रशंसा की है (मरुत्वान्) जिसकी सेना में अच्छे-अच्छे वीरजन हैं (इन्द्रः) वह परमैश्वर्यवान् सेनापति (अस्माकेभिः) हमारे शरीर, आत्मा और बल के तुल्य बलों से युक्त वीर (नृभिः) मनुष्यों के साथ वर्त्तमान होता हुआ (सूर्य्यम्)) सूर्य के प्रकाशतुल्य युद्ध न्याय को (सनत्) अच्छे प्रकार सेवन करे (सः) वह (अस्मिन्) आज के दिन (नः) हम लोगों के (ऊती) रक्षा आदि व्यवहार के लिये निरन्तर (भवतु) हो ॥ ६ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य को प्राप्त होकर सब पदार्थ अलग-अलग प्रकाशित हुए आनन्द के करनेवाले होते हैं वैसे ही धार्मिक न्यायाधीशों को प्राप्त होकर पुत्र, पौत्र, स्त्रीजन तथा सेवकों के साथ वर्त्तमान विद्या, धर्म और न्याय में प्रसिद्ध आचरणवाले होकर मनुष्य अपने और दूसरों के कल्याण करनेवाले होते हैं। जो सब कभी क्रोध को अपने वश में करने और सब प्रकार से नित्य प्रसन्नता आनन्द करनेवाला होता है, वही सेनाधीश होने में नियत करने योग्य होता है। जो बीते हुए व्यवहार के बचे हुए को जाने, चलते हुए व्यवहार में शीघ्र कर्त्तव्य काम के विचार में तत्पर है, वही सर्वदा विजय को प्राप्त होता है, दूसरा नहीं ॥ ६ ॥