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Rigveda / 1 / 101 / 9

त्वा॒येन्द्र॒ सोमं॑ सुषुमा सुदक्ष त्वा॒या ह॒विश्च॑कृमा ब्रह्मवाहः। अधा॑ नियुत्व॒: सग॑णो म॒रुद्भि॑र॒स्मिन्य॒ज्ञे ब॒र्हिषि॑ मादयस्व ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 101 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसके सङ्ग से क्या करना चाहिये और वह हम लोगों के यज्ञ में क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : त्वा॒ऽया। इ॒न्द्र॒। सोम॑म्। सु॒सु॒म॒। सु॒ऽद॒क्ष॒। त्वा॒ऽया। ह॒विः। च॒कृ॒म॒। ब्र॒ह्म॒ऽवा॒हः॒। अध॑। नि॒ऽयु॒त्वः॒। सऽग॑णः। म॒रुत्ऽभिः॑। अ॒स्मिन्। य॒ज्ञे। ब॒र्हिषि॑। मा॒द॒य॒स्व॒ ॥ १.१०१.९

पदार्थ : हे (इन्द्रः) परम विद्यारूपी ऐश्वर्य से युक्त विद्वान् ! (त्वाया) आपके साथ हुए हम लोग (सोमम्) ऐश्वर्य करनेवाले के बोध को (सुसुम) प्राप्त हों। हे (सुदक्ष) उत्तम चतुराईयुक्त बल और (ब्रह्मवाहः) अनन्तधन तथा वेदविद्या की प्राप्ति करानेहारे विद्वान् ! (त्वाया) आपके सहित हम लोग (हविः) क्रियाकौशलयुक्त काम का (चकृम) विधान करें। हे (नियुत्वः) समर्थ ! (अधा) इसके अनन्तर (मरुद्भिः) ऋत्विज् अर्थात् पढ़ानेवालों और (सगणः) अपने विद्यार्थियों के गोलों के साथ वर्त्तमान आप (अस्मिन्) इस (बर्हिषि) अत्यन्त उत्तम (यज्ञे) पढ़ने-पढ़ाने के सत्कार से पाये हुए व्यवहार में (मादयस्व) आनन्दित होओ और हम लोगों को आनन्दित करो ॥ ९ ॥

भावार्थ : विद्वानों के सङ्ग के विना निश्चय है कि कोई ऐश्वर्य्य और आनन्द को नहीं पा सकता है, इससे नव मनुष्य विद्वानों का सदा सत्कार कर इनसे विद्या और अच्छी-अच्छी शिक्षाओं को प्राप्त होकर सब प्रकार से सत्कार युक्त होवें ॥ ९ ॥