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Rigveda / 1 / 102 / 5

नाना॒ हि त्वा॒ हव॑माना॒ जना॑ इ॒मे धना॑नां धर्त॒रव॑सा विप॒न्यव॑:। अ॒स्माकं॑ स्मा॒ रथ॒मा ति॑ष्ठ सा॒तये॒ जैत्रं॒ ही॑न्द्र॒ निभृ॑तं॒ मन॒स्तव॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 102 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उनको परस्पर युद्ध में कैसे वर्त्तना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : नाना॑। हि। त्वा॒। हव॑मानाः। जनाः॑। इ॒मे। धना॑नाम्। ध॒र्तः॒। अव॑सा। वि॒प॒न्यवः॑। अ॒स्माक॑म्। स्म॒। रथ॑म्। आ। ति॒ष्ठ॒। सा॒तये॑। जैत्र॑म्। हि। इ॒न्द्र॒। निऽभृ॑तम्। मनः॑। तव॑ ॥ १.१०२.५

पदार्थ : हे (इन्द्र) यथायोग्य वीरों के रखनेवाले ! तुम (धनानाम्) राज्य की विभूतियों के (सातये) अलग-अलग बाँटने के लिये (स्म) आनन्द ही के साथ जिसमें (तव) तुम्हारी (मनः) विचार करनेवाली चित्त की वृत्ति (निभृतम्) निरन्तर धरी हो, उस (अस्माकम्) हमारे (जैत्रम्) जो बड़ा दृढ़ जिससे शत्रु जीते जाएँ (रथम्) ऐसे विजय करानेवाले विमानादि यान (हि) ही को (आतिष्ठ) अच्छे प्रकार स्वीकार कर स्थित हो। हे (धर्त्तः) धारण करनेवाले ! तुम्हारी आज्ञा में अपना वर्त्ताव रखते हुए (अवसा) रक्षा आदि आपके गुणों के साथ वर्त्तमान (नाना) अनेक प्रकार (हवमानाः) चाहे हुए (विपन्यवः) विविध व्यवहारों में चतुर बुद्धिमान् (जनाः) जन (इमे) ये प्रत्यक्षता से परीक्षा किये हम लोग (त्वाम्) तुम्हारे अनुकूल (हि) ही वर्त्ताव रक्खें ॥ ५ ॥

भावार्थ : जब मनुष्य युद्ध आदि व्यवहारों में प्रवृत्त होवें तब विरोध, ईर्ष्या, डर और आलस्य को छोड़ एक-दूसरे की रक्षा में तत्पर हो शत्रुओं को जीत और जीते हुए धनों को बाँटकर सेनापति आदि लड़नेवालों की योग्यता के अनुकूल उनके सत्कार के लिये देवें कि जिससे लड़ने का उत्साह आगे को बढ़े। सब प्रकार से ले लेना प्रीति करनेवाला नहीं और देना प्रसन्नता करनेवाला होता है, यह विचारकर सदा उक्त व्यवहार को वर्त्तें ॥ ५ ॥