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Rigveda / 1 / 103 / 3

स जा॒तूभ॑र्मा श्र॒द्दधा॑न॒ ओज॒: पुरो॑ विभि॒न्दन्न॑चर॒द्वि दासी॑:। वि॒द्वान्व॑ज्रि॒न्दस्य॑वे हे॒तिम॒स्यार्यं॒ सहो॑ वर्धया द्यु॒म्नमि॑न्द्र ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 103 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब सेना आदि का अध्यक्ष कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : सः। जा॒तूऽभ॑र्मा। श्र॒त्ऽदधा॑नः। ओजः॑। पुरः॒। वि॒ऽभि॒न्दन्। अ॒च॒र॒त्। वि। दासीः॑। वि॒द्वान्। व॒ज्रि॒न्। दस्य॑वे। हे॒तिम्। अ॒स्य॒। आर्यम्। सहः॑। व॒र्ध॒य॒। द्यु॒म्नम्। इ॒न्द्र॒ ॥ १.१०३.३

पदार्थ : हे (वज्रिन्) प्रशंसित शस्त्रसमूहयुक्त (इन्द्र) अच्छे-अच्छे पदार्थों के देनेवाले सेना आदि के स्वामी ! जो (जातूभर्मा) उत्पन्न हुए सांसारिक पदार्थों को धारण (श्रद्दधानः) और अच्छे कामों में प्रीति करनेवाले (विद्वान्) विद्वान् आप (अस्य) इस दुष्ट जन की (दासीः) नष्ट होनेहारीसी दासी प्रधान (पुरः) नगरियों को (दस्यवे) दुष्ट काम करते हुए जन के लिये (विभिन्दन्) विनाश करते हुए (व्यचरत्) विचरते हो (सः) वह आप श्रेष्ठ सज्जनों के लिये (हेतिम्) सुख के बढ़ानेवाले वज्र को (आर्य्यम्) श्रेष्ठ वा अति श्रेष्ठों के इस (सहः) बल (द्युम्न) धन वा (ओजः) और पराक्रम को (वर्धय) बढ़ाया करो ॥ ३ ॥

भावार्थ : जो मनुष्य समस्त डांकू, चोर, लबाड़, लम्पट, लड़ाई करनेवालों का विनाश और श्रेष्ठों को हर्षित कर, शारीरिक और आत्मिक बल का संपादन कर, धन, आदि पदार्थों से सुख को बढ़ाता है, वही सबको श्रद्धा करने योग्य है ॥ ३ ॥