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Rigveda / 1 / 105 / 18

अ॒रु॒णो मा॑ स॒कृद्वृक॑: प॒था यन्तं॑ द॒दर्श॒ हि। उज्जि॑हीते नि॒चाय्या॒ तष्टे॑व पृष्ट्याम॒यी वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 105 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : अ॒रु॒णः। मा॒। स॒कृत्। वृकः॑। प॒था। यन्त॑म्। द॒दर्श॑। हि। उत्। जि॒ही॒ते॒। नि॒ऽचाय्य॑। तष्टा॑ऽइव। पृ॒ष्टि॒ऽआ॒म॒यी। वि॒त्तम्। मे॒। अ॒स्य। रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥ १.१०५.१८

पदार्थ : जो (अरुणः) समस्त विद्याओं को प्राप्त होता वा प्रकाशित करता (वृकः) शान्ति आदि गुणयुक्त चन्द्रमा के समान विद्वान् (मा, सकृत्) मुझको एक बार (पथा, यन्तम्) अच्छे मार्ग से चलते हुए को (ददर्श) देखता वा उक्त गुणयुक्त महीना आदि काल विभागों को करनेवाले चन्द्रमा के तुल्य विद्वान् अच्छे मार्ग से चलते हुए को देखता है वह (निचाय्य) यथायोग्य समाधान देकर (पृष्ट्यामयी) पीठ में क्लेशरूप रोगवान् (तष्टेव) शिल्पी विद्वान् जैसे शिल्प व्यवहारों को समझाता वैसे (उज्जिहीते) उत्तमता से समझाता (हि) ही है। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये ॥ १८ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो विद्वान् चन्द्रमा के तुल्य शान्तस्वभाव और सूर्य्य के तुल्य विद्या के प्रकाश करने को स्वीकार करके संसार में समस्त विद्याओं को फैलाता है, वही आप्त अर्थात् अतिउत्तम विद्वान् है ॥ १८ ॥