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Rigveda / 1 / 108 / 4

समि॑द्धेष्व॒ग्निष्वा॑नजा॒ना य॒तस्रु॑चा ब॒र्हिरु॑ तिस्तिरा॒णा। ती॒व्रैः सोमै॒: परि॑षिक्तेभिर॒र्वागेन्द्रा॑ग्नी सौमन॒साय॑ यातम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 108 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : सम्ऽइ॑द्धेषु। अ॒ग्निषु॑। आ॒न॒जा॒ना। य॒तऽस्रु॑चा। ब॒र्हिः। ऊँ॒ इति॑। ति॒स्ति॒रा॒णा। ती॒व्रैः। सोमैः॑। परि॑ऽसिक्तेभिः। अ॒र्वाक्। आ। इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑। सौ॒म॒न॒साय॑। या॒त॒म् ॥ १.१०८.४

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो तुम (यतस्रुचा) जिनमें स्रुच् अर्थात् होम करने के काम में जो स्रुचा होती हैं, उनके समान कलाघर विद्यमान (तिस्तिराणा) वा जो यन्त्रकलादिकों से ढांपे हुए होते हैं (आनजाना) वे आप प्रसिद्ध और प्रसिद्धि करनेवाले (इन्द्राग्नी) वायु और विद्युत् अर्थात् पवन और बिजुली (तीव्रैः) तीक्ष्ण और वेगादिगुणयुक्त (सोमैः) रसरूप जलों से (परिषिक्तेभिः) सब प्रकार की किई हुई सिचाइयों के सहित (समिद्धेषु) अच्छी प्रकार जलते हुए (अग्निषु) कलाघरों की अग्नियों के होते (अर्वाक्) पीछे (बर्हिः) अन्तरिक्ष में (यातम्) पहुँचाते हैं (उ) और (सौमनसाय) उत्तम से उत्तम सुख के लिये (आ) अच्छे प्रकार आते भी हैं, उनकी अच्छी शिक्षाकर कार्यसिद्धि के लिये कलाओं में लगाने चाहिये ॥ ४ ॥

भावार्थ : जब शिल्पियों से पवन और बिजुली कार्यसिद्धि के अर्थ कलायन्त्रों की क्रियाओं से युक्त किये जाते हैं, तब ये सर्वसुखों के लाभ के लिये समर्थ होते हैं ॥ ४ ॥