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Rigveda / 1 / 110 / 7

ऋ॒भुर्न॒ इन्द्र॒: शव॑सा॒ नवी॑यानृ॒भुर्वाजे॑भि॒र्वसु॑भि॒र्वसु॑र्द॒दिः। यु॒ष्माकं॑ देवा॒ अव॒साह॑नि प्रि॒ये॒३॒॑ऽभि ति॑ष्ठेम पृत्सु॒तीरसु॑न्वताम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 110 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : ऋभवः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर श्रेष्ठ विद्वान् हमारे लिये किससे क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : ऋ॒भुः। नः॒। इन्द्रः॑। शव॑सा॑। नवी॑यान्। ऋ॒भुः। वाजे॑भिः। वसु॑ऽभिः। वसुः॑। द॒दिः। यु॒ष्माक॑म्। देवाः॑। अव॑सा। अह॑नि। प्रि॒ये। अ॒भि। ति॒ष्ठे॒म॒। पृ॒त्सु॒तीः। असु॑न्वताम् ॥ १.११०.७

पदार्थ : जो (नवीयान्) अतीव नवीन (ऋभुः) बहुत विद्याओं का प्रकाश करनेवाला विद्वान् जैसे (इन्द्रः) सूर्य्य अपने प्रकाश और आकर्षण से सबको आनन्द देता है वैसे (शवसा) विद्या और उत्तम शिक्षा के बल से (नः) हमको सुख देवे वा जो (ऋभुः) धीरबुद्धि आयुर्दा और सभ्यता का प्रकाश करनेवाला (वाजेभिः) विज्ञान, अन्न और संग्रामों से वा (वसुभिः) चक्रवर्त्ती राज्य आदि के धनों से (वसुः) आप सुख में वसने और (ददिः) दूसरों को सुखों का देनेवाला होता है उससे अपने राज्य के और सेनाजनों के (अवसा) रक्षा आदि व्यवहार के साथ वर्त्तमान (देवाः) विद्या और अच्छी शिक्षा को चाहते हुए हम विद्वान् लोग (प्रिये) प्रीति उत्पन्न करनेवाले (अहनि) दिन में (असुन्वताम्) अच्छे ऐश्वर्य के विरोधी (युष्माकम्) तुम शत्रुजनों की (पृत्सुतीः) उन सेनाओं के जो कि संबन्ध करानेवालों को ऐश्वर्य पहुँचानेवाली हैं (अभि) सम्मुख (तिष्ठेम) स्थित होवें अर्थात् उनका तिरस्कार करें ॥ ७ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अपने प्रकाश से तेजस्वी समस्त चर और अचर जीवों और समस्त पदार्थों के जीवन कराने से आनन्दित करता है वैस विद्वान्, शूरवीर और विद्वानों में अच्छे विद्वान् के सहायों से युक्त हम लोग अच्छी शिक्षा किई हुई, प्रसन्न और पुष्ट अपनी सेनाओं से जो सेना को लिए हुए हैं, उन शत्रुओं का तिरस्कार कर धार्मिक प्रजाजनों को पाल चक्रवर्त्ति राज्य को निरन्तर सेवें ॥ ७ ॥