Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 112 / 6

याभि॒रन्त॑कं॒ जस॑मान॒मार॑णे भु॒ज्युं याभि॑रव्य॒थिभि॑र्जिजि॒न्वथु॑:। याभि॑: क॒र्कन्धुं॑ व॒य्यं॑ च॒ जिन्व॑थ॒स्ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 112 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : आदिमे मन्त्रे प्रथमपादस्य द्यावापृथिव्यौ, द्वितीयस्य अग्निः, शिष्टस्य सूक्तस्याश्विनौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वे दोनों कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : याभिः॑। अन्त॑कम्। जस॑मानम्। आ॒ऽअर॑णे। भु॒ज्युम्। याभिः॑। अ॒व्य॒थिऽभिः॑। जि॒जि॒न्वथुः॑। याभिः॑। क॒र्कन्धु॑म्। व॒य्य॑म्। च॒। जिन्व॑थः। ताभिः॑। ऊँ॒ इति॑। सु। ऊ॒तिऽभिः॑। अ॒श्वि॒ना॒। आ। ग॒त॒म् ॥ १.११२.६

पदार्थ : हे (अश्विना) सभा सेना के स्वामी विद्वान् लोगो ! आप (याभिः) जिन (ऊतिभिः) रक्षाओं से (आरणे) सब ओर से युद्ध होने में (अन्तकम्) दुःखों के नाशक और (जसमानम्) शत्रुओं को मारते हुए पुरुष को (याभिः) जिन (अव्यथिभिः) पीड़ारहित आनन्दकारक रक्षाओं से (भुज्युम्) पालनेहारे पुरुष को (जिजिन्वथुः) प्रसन्न करते (च) और (याभिः) जिन रक्षाओं से (कर्कन्धुम्) कारीगरी करनेहारे (वय्यम्) ज्ञाता पुरुष की (जिन्वथः) प्रसन्नता करते हो (ताभिः, उ) उन्हीं रक्षाओं के साथ हम लोगों के प्रति (सु, आ, गतम्) अच्छे प्रकार आइये ॥ ६ ॥

भावार्थ : रक्षा करनेवाले और अधिष्ठाताओं के बिना योद्धा लोग शत्रुओं के साथ संग्राम में युद्ध करने और प्रजाओं के पालने को समर्थ नहीं हो सकते। जो प्रबन्ध से विद्वानों की रक्षा नहीं करते वे पराजय को प्राप्त होकर राज्य करने को समर्थ नहीं होते ॥ ६ ॥