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Rigveda / 1 / 112 / 13

याभि॒: सूर्यं॑ परिया॒थः प॑रा॒वति॑ मन्धा॒तारं॒ क्षैत्र॑पत्ये॒ष्वाव॑तम्। याभि॒र्विप्रं॒ प्र भ॒रद्वा॑ज॒माव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 112 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : आदिमे मन्त्रे प्रथमपादस्य द्यावापृथिव्यौ, द्वितीयस्य अग्निः, शिष्टस्य सूक्तस्याश्विनौ | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वे किसके समान क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : याभिः॑। सूर्य॑म्। प॒रि॒ऽया॒थः। प॒रा॒ऽवति॑। म॒न्धा॒तार॑म्। क्षैत्र॑ऽपत्येषु। आव॑तम्। याभिः॑। विप्र॑म्। प्र। भ॒रत्ऽवा॑जम्। आव॑तम्। ताभिः॑। ऊँ॒ इति॑। सु। ऊ॒तिऽभिः॑। अ॒श्वि॒ना॒। आ। ग॒त॒म् ॥ १.११२.१३

पदार्थ : हे (अश्विना) शिल्पविद्या के स्वामी और भृत्यो ! तुम दोनों (याभिः) जिन (ऊतिभिः) रक्षादि से (परावति) दूर देश में (सूर्य्यम्) प्रकाशमान सूर्य के समान (मन्धातारम्) विमानादि यान से शीघ्र दूर देश को पहुँचानेवाले बुद्धिमान् को (पर्याथः) सब ओर से प्राप्त होओ, (याभिः) जिन रक्षाओं से (क्षैत्रपत्येषु) माण्डलिक राजाओं के काम में उसकी (आवतम्) रक्षा करो और (भरद्वाजम्) विद्या सद्गुणों के धारण करनेवालों को समझानेवाले (विप्रम्) मेधावी पुरुष की (प्रावतम्) अच्छे प्रकार रक्षा करो, (ताभिः, उ) उन्हीं रक्षाओं से हम लोगों के प्रति (सु, आ, गतम्) प्राप्त हूजिये ॥ १३ ॥

भावार्थ : व्यवहार करनेवाले मनुष्यों से विमानादि यानों के विना दूसरे देशों में जाना-आना नहीं हो सकता, इससे बड़ा लाभ नहीं हो सकता। इस कारण नाव-विमानादि की रचना अवश्य सदा करनी चाहिये ॥ १३ ॥