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Rigveda / 1 / 112 / 19

याभि॒: पत्नी॑र्विम॒दाय॑ न्यू॒हथु॒रा घ॑ वा॒ याभि॑ररु॒णीरशि॑क्षतम्। याभि॑: सु॒दास॑ ऊ॒हथु॑: सुदे॒व्यं१॒॑ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 112 | Mantra No : 19

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : आदिमे मन्त्रे प्रथमपादस्य द्यावापृथिव्यौ, द्वितीयस्य अग्निः, शिष्टस्य सूक्तस्याश्विनौ | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब स्त्री-पुरुष को कैसे और कब विवाह करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : याभिः॑। पत्नीः॑। वि॒ऽम॒दाय॑। नि॒ऽऊ॒हथुः॑। आ। घ॒। वा॒। याभिः॑। अ॒रु॒णीः। अशि॑क्षतम्। याभिः॑। सु॒ऽदासे॑। ऊ॒हथुः॑। सु॒ऽदे॒व्य॑म्। ताभिः॑। ऊँ॒ इति॑। सु। ऊ॒तिऽभिः॑। अ॒श्वि॒ना॒। आ। ग॒त॒म् ॥ १.११२.१९

पदार्थ : हे (अश्विना) पढ़ने-पढ़ानेहारे ब्रह्मचारी लोगो ! तुम (याभिः) जिन (ऊतिभिः) रक्षाओं से (विमदाय) विविध आनन्द के लिये (पत्नीः) पति के साथ यज्ञसम्बन्ध करनेवाली विदुषी स्त्रियों को (न्यूहथुः) निश्चय से ग्रहण करो, (वा) वा (याभिः) जिन रक्षाओं से (अरुणीः) ब्रह्मचारिणी कन्याओं को (घ) ही (आ, अशिक्षतम्) अच्छे प्रकार शिक्षा करो और (याभिः) जिन रक्षादि क्रियाओं से (सुदासे) अच्छे प्रकार दान करने में (सुदेव्यम्) उत्तम विद्वानों में उत्पन्न हुए विज्ञान को (ऊहथुः) प्राप्त कराओ, (ताभिः) उन रक्षाओं से विद्या (उ) और विनय को (सु, आ, गतम्) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये ॥ १९ ॥

भावार्थ : सुख पाने की इच्छा करनेवाले पुरुष और स्त्रियों को धर्म से सेवित ब्रह्मचर्य से पूर्ण विद्या और युवावस्था को प्राप्त होकर अपनी तुल्यता से ही विवाह करना योग्य है अथवा ब्रह्मचर्य ही में ठहर के सर्वदा स्त्री-पुरुषों को अच्छी शिक्षा करना योग्य है क्योंकि तुल्य गुणकर्मस्वभाववाले स्त्री-पुरुषों के विना गृहाश्रम को धारण करके कोई किञ्चित् भी सुख वा उत्तम सन्तान को प्राप्त होने में समर्थ नहीं होते, इससे इसी प्रकार विवाह करना चाहिये ॥ १९ ॥