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Rigveda / 1 / 113 / 11

ई॒युष्टे ये पूर्व॑तरा॒मप॑श्यन्व्यु॒च्छन्ती॑मु॒षसं॒ मर्त्या॑सः। अ॒स्माभि॑रू॒ नु प्र॑ति॒चक्ष्या॑भू॒दो ते य॑न्ति॒ ये अ॑प॒रीषु॒ पश्या॑न् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 113 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर प्रभात विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : ई॒युः। ते। ये। पूर्व॑ऽतराम्। अप॑श्यन्। वि॒ऽउ॒च्छन्ती॑म्। उ॒षस॑म्। मर्त्या॑सः। अ॒स्माभिः॑। ऊँ॒ इति॑। नु। प्र॒ति॒ऽचक्ष्या॑। अ॒भू॒त्। ओ इति॑। ते। य॒न्ति॒। ये। अ॒प॒रीषु॑। पश्या॑न् ॥ १.११३.११

पदार्थ : (ये) जो (मर्त्यासः) मनुष्य लोग (व्युच्छन्तीम्) जगाती हुई (पूर्वतराम्) अति प्राचीन (उषसम्) प्रभात वेला को (ईयुः) प्राप्त होवें (ते) वे (अस्माभिः) हम लोगों के साथ सुख को (अपश्यन्) देखते हैं, जो प्रभात वेला हमारे साथ (प्रतिचक्ष्या) प्रत्यक्ष से देखने योग्य (अभूत्) होती है वह (नु) शीघ्र सुख देनेवाली होती है। (उ) और (ये) जो (अपरीषु) आनेवाली उषाओं में व्यतीत हुई उषा को (पश्यान्) देखें (ते) वे (ओ) ही सुख को (यन्ति) प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥

भावार्थ : जो मनुष्य उषा के पहिले शयन से उठ आवश्यक कर्म करके परमेश्वर का ध्यान करते हैं, वे बुद्धिमान् और धार्मिक होते हैं। जो स्त्री-पुरुष परमेश्वर का ध्यान करके प्रीति से आपस में बोलते-चालते हैं, वे अनेकविध सुखों को प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥