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Rigveda / 1 / 115 / 2

सूर्यो॑ दे॒वीमु॒षसं॒ रोच॑मानां॒ मर्यो॒ न योषा॑म॒भ्ये॑ति प॒श्चात्। यत्रा॒ नरो॑ देव॒यन्तो॑ यु॒गानि॑ वितन्व॒ते प्रति॑ भ॒द्राय॑ भ॒द्रम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 115 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : सूर्यः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर ईश्वर का कृत्य अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : सूर्यः॑। दे॒वीम्। उ॒षसम्। रोच॑मानाम्। मर्यः॑। न। योषा॑म्। अ॒भि। ए॒ति॒। प॒श्चात्। यत्र॑। नरः॑। दे॒व॒ऽयन्तः॑। यु॒गानि॑। वि॒ऽत॒न्व॒ते। प्रति॑। भ॒द्राय॑। भ॒द्रम् ॥ १.११५.२

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जिस ईश्वर ने उत्पन्न करके (कक्षा) नियम में स्थापन किया यह (सूर्य्यः) सूर्य्यमण्डल (रोचमानाम्) रुचि कराने (देवीम्) और सब पदार्थों को प्रकाशित करनेहारी (उषसम्) प्रातःकाल की वेला को उसके होने के (पश्चात्) पीछे जैसे (मर्य्यः) पति (योषाम्) अपनी स्त्री को प्राप्त हो (न) वैसे (अभ्येति) सब ओर से दौड़ा जाता है, (यत्र) जिस विद्यमान सूर्य्य में (देवयन्तः) मनोहर चाल-चलन से सुन्दर गणितविद्या को जानते-जनाते हुए (नरः) ज्योतिष विद्या के भावों को दूसरों की समझ में पहुँचानेहारे ज्योतिषी जन (युगानि) पाँच-पाँच संवत्सरों की गणना से ज्योतिष में युग वा सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग को जान (भद्राय) उत्तम सुख के लिये (भद्रम्) उस उत्तम सुख के (प्रति, वितन्वते) प्रति विस्तार करते हैं, उसी परमेश्वर को सबका उत्पन्न करनेहारा तुम लोग जानो ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! तुम लोगों से जिस ईश्वर ने सूर्य्य को बनाकर प्रत्येक ब्रह्माण्ड में स्थापन किया, उसके आश्रय से गणित आदि समस्त व्यवहार सिद्ध होते हैं, वह ईश्वर क्यों न सेवन किया जाय ॥ २ ॥