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Rigveda / 1 / 116 / 9

परा॑व॒तं ना॑सत्यानुदेथामु॒च्चाबु॑ध्नं चक्रथुर्जि॒ह्मवा॑रम्। क्षर॒न्नापो॒ न पा॒यना॑य रा॒ये स॒हस्रा॑य॒ तृष्य॑ते॒ गोत॑मस्य ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 116 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : परा॑। अ॒व॒तम्। ना॒स॒त्या॒। अ॒नु॒दे॒था॒म्। उ॒च्चाऽबु॑ध्नम्। च॒क्र॒थुः॒। जि॒ह्मऽवा॑रम्। क्षर॑न्। आपः॑। न। पा॒यना॑य। रा॒ये। स॒हस्रा॑य। तृष्य॑ते। गोत॑मस्य ॥ १.११६.९

पदार्थ : हे (नासत्या) आग और पवन के समान वर्त्तमान सभापति और सेनाधिपति ! तुम दोनों (जिह्मवारम्) जिसको टेढ़ी लगन और (उच्चाबुध्नम्) उससे जिसमें ऊँचा अन्तरिक्ष अर्थात् अवकाश उस रथ आदि को (अवतम्) रक्खो और अनेक कामों की सिद्धि (चक्रथुः) करो और उसको यथायोग्य व्यवहार में (परा, अनुदेथाम्) लगाओ। जो (गोतमस्य) अतीव स्तुति करनेवाले के रथ आदि पर (तृष्यते) प्यासे के लिये (पायनाय) पीने को (आपः) भाफरूप जल जैसे (क्षरन्) गिरते हैं (न) वैसे (सहस्राय) असंख्यात (राये) धन के लिये अर्थात् धन देने के लिये प्रसिद्ध होता है वैसे रथ आदि को बनाओ ॥ ९ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। शिल्पी लोगों को विमानादि यानों में जिसमें बहुत मीठे जल की धार मावे ऐसे कुण्ड को बना, आग से उस विमान आदि यान को चला, उसमें सामग्री को धर, एक देश से दूसरे देश को जाय और असंख्यात धन पाय के परोपकार का सेवन करना चाहिये ॥ ९ ॥