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Rigveda / 1 / 116 / 18

यदया॑तं॒ दिवो॑दासाय व॒र्तिर्भ॒रद्वा॑जायाश्विना॒ हय॑न्ता। रे॒वदु॑वाह सच॒नो रथो॑ वां वृष॒भश्च॑ शिंशु॒मार॑श्च यु॒क्ता ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 116 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : यत्। अया॑तम्। दिवः॑ऽदासाय। व॒र्तिः। भ॒रत्ऽवा॑जाय। अ॒श्वि॒ना॒। हय॑न्ता। रे॒वत्। उ॒वा॒ह॒। स॒च॒नः। रथः॑। वा॒म्। वृ॒ष॒भः। च॒। शिं॒शु॒मारः॑। च॒। यु॒क्ता ॥ १.११६.१८

पदार्थ : हे (हयन्ता) चलने (युक्ता) योगाभ्यास करने और (अश्विना) शत्रुसेना में व्याप्त होनेवाले सभा सेना के पतियो ! तुम दोनों (दिवोदासाय) न्याय और विद्या प्रकाश के देनेवाले (भरद्वाजाय) जिसके कि पुष्ट होते हुए पुष्टिमान् वेगवाले योद्धा हैं उसके लिये (यत्) जिस (वर्त्तिः) वर्त्तमान (रेवत्) अत्यन्त धनयुक्त गृह आदि वस्तु को (अयाताम्) प्राप्त होओ (च) और जो (वाम्) तुम दोनों का (वृषभः) विजय की वर्षा करानेहारा (शिंशुमारः) जिससे धर्म को उल्लङ्घ के चलानेहारों का विनाश करता है जो कि (सचनः) समस्त अपने सेनाङ्गों से युक्त (रथः) मनोहर विमानादि रथ तुम लोगों को चाहे हुए स्थान में (उवाह) पहुँचाता है, उसकी (च) तथा उक्त गृह आदि की रक्षा करो ॥ १८ ॥

भावार्थ : राजा आदि राजपुरुषों को समस्त अपनी सामग्री न्याय से राज्य की पालना करने ही के लिये बनानी चाहिये ॥ १८ ॥