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Rigveda / 1 / 118 / 7

यु॒वमत्र॒येऽव॑नीताय त॒प्तमूर्ज॑मो॒मान॑मश्विनावधत्तम्। यु॒वं कण्वा॒यापि॑रिप्ताय॒ चक्षु॒: प्रत्य॑धत्तं सुष्टु॒तिं जु॑जुषा॒णा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 118 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् | देवता : अश्विनौ | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : यु॒वम्। अत्र॑ये। अव॑ऽनीताय। त॒प्तम्। ऊर्ज॑म्। ओ॒मान॑म्। अ॒श्वि॒नौ॒। अ॒ध॒त्त॒म्। यु॒वम्। कण्वा॑य। अपि॑ऽरिप्ताय। चक्षुः॑। प्रति॑। अ॒ध॒त्त॒म्। सु॒ऽष्टु॒तिम्। जु॒जु॒षा॒णा ॥ १.११८.७

पदार्थ : हे (जुजुषाणा) सेवा वा प्रीति को प्राप्त (अश्विनौ) समस्त गुणों में व्याप्त स्त्री-पुरुषो ! (युवम्) तुम दोनों (अवनीताय) अविद्या अज्ञान के दूर होने (अपिरिप्ताय) और समस्त विद्याओं के बढ़ने के लिये (अत्रये) जिसको तीन प्रकार का दुःख नहीं है, उस (कण्वाय) बुद्धिमान् के लिये (तप्तम्) तपस्या से उत्पन्न हुए (ओमानम्) रक्षा आदि अच्छे कामों की पालना करनेवाले (ऊर्जम्) पराक्रम को (अधत्तम्) धारण करो और (युवम्) तुम दोनों उससे (चक्षुः) सकल व्यवहारों के दिखलानेहारे उत्तम ज्ञान और (सुष्टुतिम्) सुन्दर प्रशंसा को (प्रति, अधत्तम्) प्रतीति के साथ धारण करो ॥ ७ ॥

भावार्थ : सभासेनाधीश आदि राजपुरषों को चाहिये कि धर्मात्मा जो कि वेद आदि विद्या के प्रचार के लिये अच्छा यत्न करते हैं, उन विद्वानों की रक्षा का विधान कर उनसे विनय को पाकर प्रजाजनों की पालना करें ॥ ७ ॥