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Rigveda / 1 / 119 / 2

ऊ॒र्ध्वा धी॒तिः प्रत्य॑स्य॒ प्रया॑म॒न्यधा॑यि॒ शस्म॒न्त्सम॑यन्त॒ आ दिश॑:। स्वदा॑मि घ॒र्मं प्रति॑ यन्त्यू॒तय॒ आ वा॑मू॒र्जानी॒ रथ॑मश्विनारुहत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 119 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् दैर्घतमसः | देवता : अश्विनौ | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : ऊ॒र्ध्वा। धी॒तिः। प्रति॑। अ॒स्य॒। प्रऽया॑मनि। अधा॑यि। शस्म॑न्। सम्। अ॒य॒न्ते॒। आ। दिशः॑। स्वदा॑मि। घ॒र्मम्। प्रति॑। य॒न्ति॒। ऊ॒तयः॑। आ। वा॒म्। ऊ॒र्जानी॑। रथ॑म्। अ॒श्वि॒ना॒। अ॒रु॒ह॒त् ॥ १.११९.२

पदार्थ : हे (अश्विना) सभासेनाधीशो ! (वाम्) तुम दोनों की (शस्मन्) प्रशंसा के योग्य (प्रयामनि) अति उत्तम यात्रा में जो (ऊर्जानि) पराक्रमयुक्त नीति और (ऊर्ध्वा, धीतिः) उन्नतियुक्त धारणा वा ऊँची धारणा जिन मनुष्यों ने (अधायि) धारण की वे (दिशः) दान आदि उत्तम कर्म करनेहारे मनुष्य (सम्, आ, अयन्ते) भली-भाँति आते हैं। जिस (रथम्) मनोहर विमान आदि यान का शिल्पी कारुक जन (आ, अरुहत्) आरोहण करता अर्थात् उसपर चढ़ता है उसपर तुम लोग चढ़ो। जिस (घर्मम्) उज्ज्वल सुगन्धियुक्त भोजन करने योग्य पदार्थ को (ऊतयः) मनोहर रक्षा आदि व्यवहार हम लोगों के लिये (यन्ति) प्राप्त करते हैं उसको (प्रति) तुम प्राप्त होओ और जिस उज्ज्वल सुगन्धियुक्त भोजन करने योग्य पदार्थ का मैं (स्वदामि) स्वाद लेऊँ (अस्य) इसके स्वाद को तुम (प्रति) प्रतीति से प्राप्त होओ ॥ २ ॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! तुम अच्छे बने हुए, रोगों का विनाश करने और बल के देनेहारे अन्नों को भोगो। यात्रा में सब सामग्री को लेकर एक दूसरे से प्रीति और रक्षा कर-करा देश-परदेश को जाओ पर कहीं नीति को न छोड़ो ॥ २ ॥