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Rigveda / 1 / 119 / 10

यु॒वं पे॒दवे॑ पुरु॒वार॑मश्विना स्पृ॒धां श्वे॒तं त॑रु॒तारं॑ दुवस्यथः। शर्यै॑र॒भिद्युं॒ पृत॑नासु दु॒ष्टरं॑ च॒र्कृत्य॒मिन्द्र॑मिव चर्षणी॒सह॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 119 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् दैर्घतमसः | देवता : अश्विनौ | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब बिजुलीरूप अग्नि से जो तारविद्या प्रकट होती है, उसका उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

पदपाठ : यु॒वम्। पे॒दवे॑। पु॒रु॒ऽवार॑म्। अ॒श्वि॒ना॒। स्पृ॒धाम्। श्वे॒तम्। त॒रु॒तार॑म्। दु॒व॒स्य॒थः॒। शर्यैः॑। अ॒भिऽद्यु॑म्। पृत॑नासु। दु॒स्तर॑म्। च॒र्कृत्य॑म्। इन्द्र॑म्ऽइव। च॒र्ष॒णि॒ऽसह॑म् ॥ १.११९.१०

पदार्थ : हे (अश्विना) सब विद्याओं में व्याप्त सभा सेनाधीशो ! (युवम्) तुम दोनों (पेदवे) पहुँचने वा जाने को (स्पृधाम्) शत्रुओं को ईर्ष्या से बुलानेवालों की (पृतनासु) सेनाओं में (चर्कृत्यम्) निरन्तर करने के योग्य (श्वेतम्) अतीव गमन करने को बढ़े हुए (पुरुवारम्) जिससे कि बहुत लेने योग्य काम होते हैं (दुष्टरम्) जो शत्रुओं से दुःख के साथ उलांघा जा सकता (चर्षणीसहम्) जिससे मनुष्य शत्रुओं को सहते जो (शर्य्यैः) तोड़ने-फोड़ने के योग्य पेंचों से बाँधा वा (अभिद्युम्) जिसमें सब ओर बिजुली की आग चमकती, उस (इन्द्रमिव) सूर्य के प्रकाश के समान वर्त्तमान (तरुतारम्) संदेशों को तारने अर्थात् इधर-उधर पहुँचानेवाले तारयन्त्र को (दुवस्यथः) सेवो ॥ १० ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मनुष्यों से बिजुली से सिद्ध की हुई तारविद्या से चाहे हुए काम सिद्ध किये जाते हैं, वैसे ही संन्यासी के सङ्ग से समस्त विद्याओं को पाकर धर्म आदि काम करने को समर्थ होते हैं। इन्हीं दोनों से व्यवहार और परमार्थसिद्धि करी जा सकती है, इससे यत्न के साथ तडित्-तारविद्या अवश्य सिद्ध करनी चाहिये ॥ १० ॥इस सूक्त में राजा-प्रजा, संन्यासी-महात्माओं की विद्या के विचार का आचरण कहने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये ॥यह २१ इक्कीसवाँ वर्ग और ११९ एकसौ उन्नीसवाँ सूक्त पूरा हुआ ॥