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Rigveda / 1 / 120 / 6

श्रु॒तं गा॑य॒त्रं तक॑वानस्या॒हं चि॒द्धि रि॒रेभा॑श्विना वाम्। आक्षी शु॑भस्पती॒ दन् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 120 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : उशिक्पुत्रः कक्षीवान् | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराडार्ष्युष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर पढ़ने-पढ़ाने की विधि का उपदेश अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : श्रु॒तम्। गा॒य॒त्रम्। तक॑वानस्य। अ॒हम्। चि॒त्। हि। रि॒रेभ॑। अ॒श्वि॒ना॒। वा॒म्। आ। अ॒क्षी इति॑। शु॒भः॒। प॒ती॒ इति॑। दन् ॥ १.१२०.६

पदार्थ : हे (अक्षी) रूपों के दिखानेहारी आँखों के समान वर्त्तमान (शुभस्पती) धर्म के पालने और (अश्विना) विद्या की प्राप्ति कराने वा उपदेश करनेहारे विद्वानो ! (वाम्) तुम्हारे तीर से (तकवानस्य) विद्या पाये विद्वान् के (चित्) भी (गायत्रम्) उस ज्ञान को जो गानेवाले की रक्षा करता है वा (श्रुतम्) सुने हुए उत्तम व्यवहार को (आ, दन्) ग्रहण करता हुआ (अहम्) मैं (हि) ही (रिरेभ) उपदेश करूँ ॥ ६ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो-जो उत्तम विद्वानों से पढ़ा वा सुना है, उस-उस को औरों को नित्य पढ़ाया और उपदेश किया करें। मनुष्य जैसे औरों से विद्या पावे वैसे ही देवे क्योंकि विद्यादान के समान कोई और धर्म बड़ा नहीं है ॥ ६ ॥