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Rigveda / 1 / 121 / 12

त्वमि॑न्द्र॒ नर्यो॒ याँ अवो॒ नॄन्तिष्ठा॒ वात॑स्य सु॒युजो॒ वहि॑ष्ठान्। यं ते॑ का॒व्य उ॒शना॑ म॒न्दिनं॒ दाद्वृ॑त्र॒हणं॒ पार्यं॑ ततक्ष॒ वज्र॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 121 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : औशिजो दैर्घतमसः कक्षीवान् | देवता : विश्वे देवा इन्द्रश्च | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : त्वम्। इ॒न्द्र॒। नर्यः॑। यान्। अवः॑। नॄन्। तिष्ठ॑। वात॑स्य। सु॒ऽयुजः॒। वहि॑ष्ठान्। यम्। ते॒। का॒व्यः। उ॒शना॑। म॒न्दिन॑म्। दात्। वृ॒त्र॒ऽहन॑म्। पार्य॑म्। त॒त॒क्ष॒। वज्र॑म् ॥ १.१२१.१२

पदार्थ : हे (इन्द्र) प्रजा पालनेहारे (काव्यः) धीर उत्तम बुद्धिमान् के पुत्र (उशना) धर्म की कामना करनेहारे (नर्य्यः) मनुष्यों में साधु श्रेष्ठ हुए जन ! (त्वम्) आप (यान्) जिन (वहिष्ठान्) अतीव विद्या धर्म की प्राप्ति करानेहारे (वातस्य) प्राण के बीच योगाभ्यास से (सुयुजः) अच्छे युक्त योगी (नॄन्) धार्मिक जनों की (अवः) रक्षा करते हो उनके साथ धर्म के बीच (तिष्ठ) स्थिर होओ, जो (ते) आपके लिये (यम्) जिस (वृत्रहणम्) शत्रुओं के मारनेवाले वीर (मन्दिनम्) प्रशंसा के योग्य (पार्य्यम्) जिससे पूर्ण काम बने उस मनुष्य को (दात्) देवे वा जो शत्रुओं पर (वज्रम्) अति तेज शस्त्र और अस्त्रों को (ततक्ष) फेंके, उस-उसके साथ भी धर्म से वर्त्तो ॥ १२ ॥

भावार्थ : जैसे राजपुरुष परमेश्वर की उपासना करने, पढ़ने और उपदेश करनेवाले तथा और उत्तम व्यवहारों में स्थिर प्रजा और सेनाजनों की रक्षा करें, वैसे वे भी उनकी निरन्तर रक्षा किया करें ॥ १२ ॥