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Rigveda / 1 / 123 / 7

अपा॒न्यदेत्य॒भ्य१॒॑न्यदे॑ति॒ विषु॑रूपे॒ अह॑नी॒ सं च॑रेते। प॒रि॒क्षितो॒स्तमो॑ अ॒न्या गुहा॑क॒रद्यौ॑दु॒षाः शोशु॑चता॒ रथे॑न ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 123 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमसः पुत्रः कक्षीवान् | देवता : उषाः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : अप॑। अ॒न्यत्। एति॑। अ॒भि। अ॒न्यत्। ए॒ति॒। विषु॑रूपे॒ इति॒ विषु॑ऽरूपे। अह॑नी॒ इति॑। सम्। च॒रे॒ते॒ इति॑। प॒रि॒ऽक्षितोः॑। तमः॑। अ॒न्या। गुहा॑। अ॒कः॒। अद्यौ॑त्। उ॒षाः। शोशु॑चता। रथे॑न ॥ १.१२३.७

पदार्थ : जो (विषुरूपे) संसार में व्याप्त (अहनी) रात्रि और दिन एक साथ (सं, चरेते) सञ्चार करते अर्थात् आते-जाते हैं उनमें (परिक्षितोः) सब ओर से वसनेहारे अन्धकार और उजेले के बीच से (गुहा) अन्धकार से संसार को ढाँपनेवाली (तमः) रात्री (अन्या) और कामों को (अकः) करती तथा (उषाः) सूर्य के प्रकाश से पदार्थों को तपानेवाला दिन (शोशुचता) अत्यन्त प्रकाश और (रथेन) रमण करने योग्य रूप से (अद्यौत्) उजेला करता (अन्यत्) अपने से भिन्न प्रकाश को (अप, एति) दूर करता तथा (अन्यत्) अन्य प्रकाश को (अभ्येति) सब ओर से प्राप्त होता, इस सब व्यवहार के समान स्त्री-पुरुष अपना वर्त्ताव वर्तें ॥ ७ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। इस जगत् में अन्धेरा-उजेला दो पदार्थ हैं, जिनसे सदैव पृथिवी आदि लोकों के आधे भाग में दिन और आधे में रात्रि रहती है। जो वस्तु अन्धकार को छोड़ता वह उजेले का ग्रहण करता और जितना प्रकाश अन्धकार को छोड़ता उतना रात्रि लेती, दोनों पारी से सदैव अपनी व्याप्ति के साथ पाये-पाये हुए पदार्थ को ढाँपते और दोनों एक साथ वर्त्तमान हैं। उनका जहाँ-जहाँ संयोग है वहाँ-वहाँ संध्या और जहाँ-जहाँ वियोग होता अर्थात् अलग होते वहाँ-वहाँ रात्रि और दिन होता। जो स्त्री-पुरुष ऐसे मिल और अलग होकर दुःख के कारणों को छोड़ते और सुख के कारणों को ग्रहण करते वे सदैव आनन्दित होते हैं ॥ ७ ॥