Rigveda / 1 / 123 / 10
क॒न्ये॑व त॒न्वा॒३॒॑ शाश॑दानाँ॒ एषि॑ देवि दे॒वमिय॑क्षमाणम्। सं॒स्मय॑माना युव॒तिः पु॒रस्ता॑दा॒विर्वक्षां॑सि कृणुषे विभा॒ती ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 123 | Mantra No : 10
In English:
Seer : diirghatamasaH putraH kakShiivaan | Devta : uShaaH | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : kanyeva tanvaa3 shaashadaanaa.N eShi devi devamiyakShamaaNam. sa.msmayamaanaa yuvatiH purastaadaavirvakShaa.msi kRRiNuShe vibhaatii .
Component Words : kanyaa.aiva. tanvaa. shaashadaanaa. eShi. devi. devam. iyakShamaaNam. sam.asmayamaanaa. yuvatiH. purastaat. aaviH. vakShaa.msi. kRRiNuShe. vi.abhaatii . 1.123.10
In Hindi:
ऋषि : दीर्घतमसः पुत्रः कक्षीवान् | देवता : उषाः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : क॒न्या॑ऽइव। त॒न्वा॑। शाश॑दाना। एषि॑। दे॒वि॒। दे॒वम्। इय॑क्षमाणम्। स॒म्ऽस्मय॑माना। यु॒व॒तिः। पु॒रस्ता॑त्। आ॒विः। वक्षां॑सि। कृ॒णु॒षे॒। वि॒ऽभा॒ती ॥ १.१२३.१०
पदार्थ : हे (देवि) कामना करनेहारी कुमारी ! जो तूँ (तन्वा) शरीर से (कन्येव) कन्या के समान वर्त्तमान (शाशदाना) व्यवहारों में अति तेजी दिखाती हुई (इयक्षमाणम्) अत्यन्त सङ्ग करते हुए (देवम्) विद्वान् पति को (एषि) प्राप्त होती (पुरस्तात्) और सन्मुख (विभाती) अनेक प्रकार सद्गुणों से प्रकाशमान (युवतिः) ज्वानी को प्राप्त हुई (संस्मयमाना) मन्द-मन्द हँसती हुई (वक्षांसि) छाती आदि अङ्गों को (आविः, कृणुषे) प्रसिद्ध करती है, सो तूँ प्रभात वेला की उपमा को प्राप्त होती है ॥ १० ॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विदुषी ब्रह्मचारिणी स्त्री पूरी विद्या शिक्षा और अपने समान मनमाने पति को पा कर सुखी होती है, वैसे ही और स्त्रियों को भी आचरण करना चाहिये ॥ १० ॥
In Sanskrit:
ऋषि : दीर्घतमसः पुत्रः कक्षीवान् | देवता : उषाः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ।
पदपाठ : क॒न्या॑ऽइव। त॒न्वा॑। शाश॑दाना। एषि॑। दे॒वि॒। दे॒वम्। इय॑क्षमाणम्। स॒म्ऽस्मय॑माना। यु॒व॒तिः। पु॒रस्ता॑त्। आ॒विः। वक्षां॑सि। कृ॒णु॒षे॒। वि॒ऽभा॒ती ॥ १.१२३.१०
पदार्थ : (कन्येव) कन्यावद्वर्त्तमाना (तन्वा) शरीरेण (शाशदाना) व्यवहारेष्वतितीक्ष्णतामाचरन्ती (एषि) प्राप्नोषि (देवि) कामयमाने (देवम्) विद्वांसम् (इयक्षमाणम्) अतिशयेन सङ्गच्छमानम् (संस्मयमाना) सम्यङ् मन्दहासयुक्ता (युवतिः) चतुर्विंशतिवार्षिकी (पुरस्तात्) प्रथमतः (आविः) प्रसिद्धौ (वक्षांसि) उरांसि (कृणुषे) (विभाती) विविधतया सद्गुणैः प्रकाशमाना ॥ १० ॥
अन्वय : हे देवि या त्वं तन्वा कन्येव शाशदानेयक्षमाणं देवं पतिमेषि पुरस्ताद् विभाती युवतिः संस्मयमाना वक्षांस्याविष्कृणुषे सोषरुपमा जायसे ॥ १० ॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः। यथा विदुषी ब्रह्मचारिणी पूर्णां विद्यां शिक्षां स्वसदृशं हृद्यं पतिं च प्राप्य सुखिनी भवति तथान्याभिरप्याचरणीयम् ॥ १० ॥