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Rigveda / 1 / 126 / 3

उप॑ मा श्या॒वाः स्व॒नये॑न द॒त्ता व॒धूम॑न्तो॒ दश॒ रथा॑सो अस्थुः। ष॒ष्टिः स॒हस्र॒मनु॒ गव्य॒मागा॒त्सन॑त्क॒क्षीवाँ॑ अभिपि॒त्वे अह्ना॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 126 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : कक्षीवान् | देवता : विद्वाँसः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर राजा को क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

पदपाठ : उप॑। मा॒। श्या॒वाः। स्व॒नये॑न। द॒त्ताः। व॒धूऽम॑न्तः। दश॑। रथा॑सः। अ॒स्थुः॒। ष॒ष्टिः। स॒हस्र॑म्। अनु॑। गव्य॑म्। आ। अ॒गा॒त्। सन॑त्। क॒क्षीवा॑न्। अ॒भि॒ऽपि॒त्वे। अह्ना॑म् ॥ १.१२६.३

पदार्थ : जिस (स्वनयेन) अपने धन आदि पदार्थ के पहुँचाने अर्थात् देनेवाले ने (श्यावाः) सूर्य की किरणों के समान (दत्ताः) दिये हुए (दश) दश (रथासः) रथ (वधूमन्तः) जिनमें प्रशंसित बहुएँ विद्यमान वे (मा) मुझ सेनापति के (उपास्थुः) समीप स्थित होते तथा जो (कक्षीवान्) युद्ध में प्रशंसित कक्षावाला अर्थात् जिसकी ओर अच्छे वीर योद्धा हैं वह (अभिपित्वे) सब ओर से प्राप्ति के निमित्त (अह्नाम्, सहस्रम्) हजार दिन (गव्यम्) गौओं के दुग्ध आदि पदार्थ को (अन्वागात्) प्राप्त होता और जिसके (षष्टिः) साठ पुरुष पीछे चलते वह (सनत्) सदा सुख का बढ़ानेवाला है ॥ ३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस कारण सब योद्धा राजा के समीप से धन आदि पदार्थ की प्राप्ति चाहते हैं, इससे राजा को उनके लिये यथायोग्य धन आदि पदार्थ देना योग्य है, ऐसे विना किये उत्साह नहीं होता ॥ ३ ॥