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Rigveda / 1 / 128 / 2

तं य॑ज्ञ॒साध॒मपि॑ वातयामस्यृ॒तस्य॑ प॒था नम॑सा ह॒विष्म॑ता दे॒वता॑ता ह॒विष्म॑ता। स न॑ ऊ॒र्जामु॒पाभृ॑त्य॒या कृ॒पा न जू॑र्यति। यं मा॑त॒रिश्वा॒ मन॑वे परा॒वतो॑ दे॒वं भाः प॑रा॒वत॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 128 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिगष्टिः | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर विद्वान् क्या करता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : तम्। य॒ज्ञ॒ऽसाध॑म्। अपि॑। वा॒त॒या॒म॒सि॒। ऋ॒तस्य॑। प॒था। नम॑सा। ह॒विष्म॑ता। दे॒वऽता॑ता। ह॒विष्म॑ता। सः। नः॒। ऊ॒र्जाम्। उ॒प॒ऽआभृ॑ति। अ॒या। कृ॒पा। न। जू॒र्य॒ति॒। यम्। मा॒त॒रिश्वा॑। मन॑वे। प॒रा॒ऽवतः॑। दे॒वम्। भारिति॒ भाः। प॒रा॒ऽवतः॑ ॥ १.१२८.२

पदार्थ : जैसे (यम्) जिस (देवम्) गुण देनेवाले को (परावतः) दूर से जो (भाः) सूर्य की कान्ति उसके समान (मनवे) मनुष्य के लिये (मातरिश्वा) पवन (परावतः) दूर से धारण करता (सः) वह देनेवाला विद्वान् (अया) इस (कृपा) कल्पना से (नः) हम लोगों को (ऊर्जाम्) पराक्रमवाले पदार्थों का (उपाभृति) समीप आया हुआ आभूषण अर्थात् सुन्दरपन जैसे हो वैसे (न) नहीं (जूर्यति) रोगी करता और जैसे वह (देवताता) विद्वान् के समान (हविष्मता) बहुत देनेवाले (ऋतस्य) सत्य के (पथा) मार्ग से चलता है वैसे (हविष्मता) बहुत ग्रहण करनेवाले (नमसा) सत्कार के साथ (तम्) उस अग्नि के समान प्रतापी (यज्ञसाधम्) यज्ञ साधनेवाले विद्वान् को (अपि) निश्चय के साथ हम लोग (वातयामसि) पवन के समान सब कार्यों में प्रेरणा देवें ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् मनुष्य जैसे पवन सब मूर्त्तिमान् पदार्थों को धारण करके प्राणियों को सुखी करता, वैसे ही विद्या और धर्म को धारण कर सब मनुष्यों को सुख देवे ॥ २ ॥