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Rigveda / 1 / 129 / 5

नि षू न॒माति॑मतिं॒ कय॑स्य चि॒त्तेजि॑ष्ठाभिर॒रणि॑भि॒र्नोतिभि॑रु॒ग्राभि॑रुग्रो॒तिभि॑:। नेषि॑ णो॒ यथा॑ पु॒राने॒नाः शू॑र॒ मन्य॑से। विश्वा॑नि पू॒रोरप॑ पर्षि॒ वह्नि॑रा॒सा वह्नि॑र्नो॒ अच्छ॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 129 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिगतिशक्वरी | स्वर : पञ्चमः

विषय : इस संसार में कौन सुख का देनेवाला होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : नि। सु। न॒म॒। अति॑ऽमतिम्। कय॑स्य। चि॒त्। तेजि॑ष्ठाभिः। अ॒रणि॑ऽभिः। न। ऊ॒तिऽभिः॑। उ॒ग्राभिः॑। उ॒ग्र॒। ऊ॒तिऽभिः॑। नेषि॑। नः॒। यथा॑। पु॒रा। अ॒ने॒नाः। शू॒र॒। मन्य॑से। विश्वा॑नि। पू॑रोः। अप॑। प॒र्षि॒। वह्निः॑। आ॒सा। वह्निः॑। नः॒। अच्छ॑ ॥ १.१२९.५

पदार्थ : हे (उग्र) तेजस्वी (शूर) दुष्टों को मारनेवाले विद्वान् ! (तेजिष्ठाभिः) अतीव प्रातपयुक्त (अरणिभिः) सुख देनेवाली (उग्राभिः) तीव्र (ऊतिभिः) रक्षा आदि क्रियाओं (न) के समान (ऊतिभिः) रक्षाओं से (अतिमतिम्) अत्यन्त विचारवाली बुद्धि को (नि, नम) नमो अर्थात् नम्रता के साथ वर्त्तो वा (यथा) जैसे (अनेनाः) पापरहित मनुष्य (पुरा) पहिले उत्तम कामों की प्राप्ति करता वैसे (नः) हम लोगों को आप (मन्यसे) जानते और (सु, नेषि) सुन्दरता से अच्छे कामों को प्राप्त कराते वा (आसा) अपने पास (वह्निः) पहुँचानेवाले के समान (नः) हमको (अच्छ, पर्षि) अच्छे सींचते वा (कयस्य) विशेष ज्ञान देने और (पूरोः) पूरे विद्वान् मनुष्य के (चित्) भी (वह्निः) पहुँचानेवाले आप (विश्वानि) समग्र दुःखों को (अप) दूर करते हो सो आप हम लोगों के सेवन करने योग्य हो ॥ ५ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्यों की बुद्धि को उत्तम रक्षा से बढ़ा कर पाप कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न करता, वही सभों को सुखों को पहुँचा सकता है ॥ ५ ॥