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Rigveda / 1 / 130 / 8

इन्द्र॑: स॒मत्सु॒ यज॑मान॒मार्यं॒ प्राव॒द्विश्वे॑षु श॒तमू॑तिरा॒जिषु॒ स्व॑र्मीळ्हेष्वा॒जिषु॑। मन॑वे॒ शास॑दव्र॒तान्त्वचं॑ कृ॒ष्णाम॑रन्धयत्। दक्ष॒न्न विश्वं॑ ततृषा॒णमो॑षति॒ न्य॑र्शसा॒नमो॑षति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 130 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : अष्टिः | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर मनुष्यों को कैसा होना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : इन्द्रः॑। स॒मत्ऽसु॑। यज॑मानम्। आर्य॑म्। प्र। आ॒व॒त्। विश्वे॑षु। श॒तम्ऽऊ॑तिः। आ॒जिषु॑। स्वः॑ऽमीळ्हेषु। आ॒जिषु॑। मन॑वे। शास॑त्। अ॒व्र॒तान्। त्वच॑म्। कृ॒ष्णाम्। अ॒र॒न्ध॒य॒त्। दक्ष॑म्। न। विश्व॑म्। त॒तृ॒षा॒णम्। ओ॒ष॒ति॒। नि। अ॒र्श॒सा॒नम्। ओ॒ष॒ति॒ ॥ १.१३०.८

पदार्थ : जो (शतमूतिः) अर्थात् जिससे असंख्यात रक्षा होती वह (इन्द्रः) परम ऐश्वर्यवान् राजा (स्वर्मीढेषु) जिनमें सुख सिञ्चन किया जाता उन (आजिषु) प्राप्त हुए (आजिषु) संग्रामों में धार्मिक शूरवीरों के समान (विश्वेषु) समग्र (समत्सु) संग्राम में (यजमानम्) अभय के देनेवाले (आर्यम्) उत्तम गुण, कर्म, स्वभाववाले पुरुष को (प्रावत्) अच्छे प्रकार पाले वा (मनवे) विचारशील धार्मिक मनुष्य की रक्षा के लिये (अव्रतान्) दुष्ट आचरण करनेवाले डाकुओं को (शासत्) शिक्षा देवे और इनकी (त्वचम्) सम्बन्ध करनेवाली खाल को (कृष्णाम्) खैंचता हुआ (अरन्धयत्) नष्ट करे वा अग्नि जैसे (विश्वम्) सब पदार्थ मात्र को (दक्षन्) जलावे और (ततृषाणम्) पियासे प्राणी को (ओषति) दाहे अति जलन देवे (न) वैसे (अर्शसानम्) प्राप्त हुए शत्रुगण को (न्योषति) निरन्तर जलावे, वही चक्रवर्त्ति राज्य करने योग्य होता है ॥ ८ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभावों को स्वीकार और दुष्टों के गुण, कर्म, स्वभावों का त्याग कर श्रेष्ठों को रक्षा और दुष्टों को ताड़ना देकर धर्म में राज्य की शासना करें ॥ ८ ॥