Rigveda / 1 / 133 / 4
यासां॑ ति॒स्रः प॑ञ्चा॒शतो॑ऽभिव्ल॒ङ्गैर॒पाव॑पः। तत्सु ते॑ मनायति त॒कत्सु ते॑ मनायति ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 133 | Mantra No : 4
In English:
Seer : paruchChepo daivodaasiH | Devta : indra: | Metre : viraaDanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yaasaa.m tisraH pa~nchaashato.abhivla~NgairapaavapaH. tatsu te manaayati takatsu te manaayati .
Component Words : yaasaam. tisraH. pa~nchaashataH. abhi.avla~NgaiH. apa.aavapaH. tat. su. te. manaayati. takat. su. te. manaayati . 1.133.4
In Hindi:
ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : यासा॑म्। ति॒स्रः। प॒ञ्चा॒शतः॑। अ॒भि॒ऽव्ल॒ङ्गैः। अ॒प॒ऽअव॑पः। तत्। सु। ते॒। म॒ना॒य॒ति॒। त॒कत्। सु। ते॒। म॒ना॒य॒ति॒ ॥ १.१३३.४
पदार्थ : हे परम उत्तम धनयुक्त राजन् ! (यासाम्) जिन शत्रुसेनाओं के बीच (तिस्रः) तीन वा (पञ्चाशतः) पचास सेनाओं को (अभिव्लङ्गैः) चारों ओर से जाने-आने आदि व्यवहारों से (अपावपः) दूर पहुँचाओ, उन सेनाओं का (तत्) वह पहुँचाना (ते) तेरे लिये (सुमनायति) अच्छे अपने मन के समान आचरण करता फिर भी (तकत्) वह (ते) तेरे लिये (सुमनायति) अच्छे अपने मन के समान आचरण करता है ॥ ४ ॥
भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि ऐसा बल बढ़ावें जिससे एक ही वीर पचास दुष्ट शत्रुओं को जीते और अपने बल की रक्षा करे ॥ ४ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ।
पदपाठ : यासा॑म्। ति॒स्रः। प॒ञ्चा॒शतः॑। अ॒भि॒ऽव्ल॒ङ्गैः। अ॒प॒ऽअव॑पः। तत्। सु। ते॒। म॒ना॒य॒ति॒। त॒कत्। सु। ते॒। म॒ना॒य॒ति॒ ॥ १.१३३.४
पदार्थ : (यासाम्) (तिस्रः) त्रित्वसंख्याताः (पञ्चाशतः) एतत्संख्याताः (अभिव्लङ्गैः) अभितो गमनागमनैः (अपावपः) दूरे प्रक्षिप (तत्) (सु) (ते) तुभ्यम् (मनायति) आत्मनो मन इवाचरति (तकत्) (सु) (ते) तुभ्यम् (मनायति) ॥ ४ ॥
अन्वय : हे मघवन् यासां तिस्राः पञ्चाशतः सेना अभिव्लङ्गैरपावपस्तासां तत् ते सुमनायति तकत् ते सु मनायति ॥ ४ ॥
भावार्थ : मनुष्यैरीदृशं बलं वर्द्धनीयं येनैकोऽपि दुष्टानां सार्धशतस्य विजयं कुर्यात् स्वकीयं बलं रक्षेत् ॥ ४ ॥