Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 135 / 2

तुभ्या॒यं सोम॒: परि॑पूतो॒ अद्रि॑भिः स्पा॒र्हा वसा॑न॒: परि॒ कोश॑मर्षति शु॒क्रा वसा॑नो अर्षति। तवा॒यं भा॒ग आ॒युषु॒ सोमो॑ दे॒वेषु॑ हूयते। वह॑ वायो नि॒युतो॑ याह्यस्म॒युर्जु॑षा॒णो या॑ह्यस्म॒युः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 135 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : वायु: | छन्द : विराडत्यष्टिः | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करके क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : तुभ्य॑। अ॒यम्। सोमः॑। परि॑ऽपूतः। अद्रि॑ऽभिः। स्पा॒र्हा। वसा॑नः। परि॑। कोश॑म्। अ॒र्ष॒ति॒। शु॒क्रा। वसा॑नः। अ॒र्ष॒ति॒। तव॑। अ॒यम्। भा॒गः। आ॒युषु॑। सोमः॑। दे॒वेषु॑। हू॒य॒ते॒। वह॑। वा॒यो॒ इति॑। नि॒ऽयुतः॑। या॒हि॒। अ॒स्म॒ऽयुः। जु॒षा॒णः। या॒हि॒। अ॒स्म॒ऽयुः ॥ १.१३५.२

पदार्थ : हे (वायो) विद्वान् ! आप (नियुतः) कला कौशल से नियत किये हुए घोड़ों को जैसे पवन वैसे अपने यानों को एक देश से दूसरे देश को (वह) पहुँचाओ और (जुषाणः) प्रसन्नचित्त (अस्मयुः) मेरे समान आचरण करते हुए (याहि) पहुँचो (अस्मयुः) मेरे समान आचरण करते हुए आओ जिस (तव) आपका (अयम्) यह (आयुषु) जीवनों और (देवेषु) विद्वानों में (सोमः) ओषधिगण के समान (भागः) सेवन करने योग्य भाग है वा जो आप (हूयते) स्तुति किये जाते हैं सो (वसानः) वस्त्र आदि ओढ़े हुए (शुक्रा) शुद्ध व्यवहारों को (अर्षति) प्राप्त होते हैं जो (अयम्) यह (अद्रिभिः) मेघों से (परिपूतः) सब ओर से पवित्र हुआ (सोमः) चन्द्रमा के समान प्रशंसा किया जाता वा (कोशम्) मेघ को (पर्य्यर्षति) सब ओर से प्राप्त होता उसके समान (स्पार्हा) चाहे हुए वस्त्रों को (वसानः) धारण किये हुए आप प्राप्त होवें, उन (तुभ्य) आपके लिये उक्त सब वस्तु प्राप्त हों ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्रशंसित कपड़े-गहने पहिने हुए सुन्दर रूपवान् अच्छे आचरण करते हैं, वे सर्वत्र प्रशंसा को प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥