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Rigveda / 1 / 135 / 8

अत्राह॒ तद्व॑हेथे॒ मध्व॒ आहु॑तिं॒ यम॑श्व॒त्थमु॑प॒तिष्ठ॑न्त जा॒यवो॒ऽस्मे ते स॑न्तु जा॒यव॑:। सा॒कं गाव॒: सुव॑ते॒ पच्य॑ते॒ यवो॒ न ते॑ वाय॒ उप॑ दस्यन्ति धे॒नवो॒ नाप॑ दस्यन्ति धे॒नव॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 135 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : वायु: | छन्द : निचृदष्टिः | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : अत्र॑। अह॑। तत्। व॒हे॒थे॒ इति॑। मध्वः॑। आऽहु॑तिम्। यम्। अ॒श्व॒त्थम्। उ॒प॒ऽतिष्ठ॑न्त। जा॒यवः॑। अ॒स्मे इति॑। ते। स॒न्तु॒। जा॒यवः॑। सा॒कम्। गावः॑। सुव॑ते। पच्य॑ते। यवः॑। न। ते॒। वा॒यो॒ इति॑। उप॑। द॒स्य॒न्ति॒। धे॒नवः॑। न। अप॑। द॒स्य॒न्ति॒। धे॒नवः॑ ॥ १.१३५.८

पदार्थ : हे (वायो) पवन के समान विद्वान् ! जो पढ़ाने और उपदेश करनेवाले (अत्राह) यहीं निश्चय से (तत्) उस विषय को (वहेथे) प्राप्त कराते वा (अश्वत्थम्) जैसे पीपलवृक्ष को पखेरू वैसे (जायवः) जीतनेहारे (यम्) जिन आपके (उपतिष्ठन्त) समीप स्थित हों और (मध्वः) मधुर विज्ञान के (आहुतिम्) सब प्रकार ग्रहण करने को उपस्थित हों (ते) वे (अस्मे) हम लोगों के बीच (जायवः) जीतनेहारे शूर (सन्त) हों, ऐसे अच्छे प्रकार आचरण करते हुए (ते) आपकी (गावः) गौयें (साकम्) साथ (सुवते) विआती (यवः) मिला वा पृथक्-पृथक् व्यवहार साथ (पच्यते) सिद्ध होता तथा (धेनवः) गौयें जैसे (अप, दस्यन्ति) नष्ट नहीं होतीं (न) वैसे (धेनवः) वाणी (न, उप, दस्यन्ति) नहीं नष्ट होतीं ॥ ८ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सब मनुष्यों से श्रेष्ठ मनुष्यों के सङ्ग की कामना और आपस में प्रीति की जाय तो उनकी विद्या बल की हानि और भेदबुद्धि न उत्पन्न हो ॥ ८ ॥