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Rigveda / 1 / 140 / 3

कृ॒ष्ण॒प्रुतौ॑ वेवि॒जे अ॑स्य स॒क्षिता॑ उ॒भा त॑रेते अ॒भि मा॒तरा॒ शिशु॑म्। प्रा॒चाजि॑ह्वं ध्व॒सय॑न्तं तृषु॒च्युत॒मा साच्यं॒ कुप॑यं॒ वर्ध॑नं पि॒तुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 140 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : कृ॒ष्ण॒ऽप्रुतौ॑। वे॒वि॒जे इति॑। अ॒स्य॒। स॒ऽक्षितौ॑। उ॒भा। त॒रे॒ते॒ इति॑। अ॒भि। मा॒तरा॑। शिशु॑म्। प्रा॒चाऽजि॑ह्वम्। ध्व॒सय॑न्तम्। तृ॒षु॒ऽच्युत॑म्। आ। साच्य॑म्। कुप॑यम्। वर्ध॑नम्। पि॒तुः ॥ १.१४०.३

पदार्थ : जिस (प्राचाजिह्वम्) दुग्ध आदि के देने से पहिले अच्छे प्रकार जीभ निकालने (ध्वसयन्तम्) गोदी से नीचे गिरने (तृषुच्युतम्) वा शीघ्र गिरे हुए (आ, साच्यम्) अच्छे प्रकार सम्बन्ध करने अर्थात् उठा लेने (कुपयम्) गोपित रखने योग्य और (पितुः) पिता का (वर्द्धनम्) यश वा प्रेम बढ़ानेवाले (शिशुम्) बालक को (सक्षितौ) एक साथ रहनेवाली (मातरा) धायी और माता (अभि, तरेते) दुःख से उत्तीर्ण करती (अस्य) इस बालक की वे (उभा) दोनों मातायें (कृष्णप्रुतौ) विद्वानों के उपदेश से चित्त के आकर्षण धर्म को प्राप्त हुई (वेविजे) निरन्तर कँपती हैं अर्थात् डरती हैं कि कथंचित् बालक को दुःख न हो ॥ ३ ॥

भावार्थ : भले-बुरे का ज्ञान बढ़ाने, रोग आदि बढ़े क्लेशों को दूर करने और प्रेम उत्पन्न करानेवाले विद्वानो के उपदेश को पाये हुए भी बालक की माता अर्थात् दूध पिलानेवाली धाय और उत्पन्न करानेवाली निज माता अपने प्रेम से सर्वदा डरती हैं ॥ ३ ॥