Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 140 / 5

आद॑स्य॒ ते ध्व॒सय॑न्तो॒ वृथे॑रते कृ॒ष्णमभ्वं॒ महि॒ वर्प॒: करि॑क्रतः। यत्सीं॑ म॒हीम॒वनिं॒ प्राभि मर्मृ॑शदभिश्व॒सन्त्स्त॒नय॒न्नेति॒ नान॑दत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 140 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अग्निः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : आत्। अ॒स्य॒। ते। ध्व॒सय॑न्तः। वृथा॑। ई॒र॒ते॒। कृ॒ष्णम्। अभ्व॑म्। महि॑। वर्पः॑। करि॑क्रतः। यत्। सी॒म्। म॒हीम्। अ॒वनि॑म्। प्र। अ॒भि। मर्मृ॑शत्। अ॒भि॒ऽश्व॒सन्। स्त॒नयन्। एति॑। नान॑दत् ॥ १.१४०.५

पदार्थ : (यत्) जो (कृष्णम्) काले वर्ण के (अभ्वम्) न होनेवाले (महि) बड़े (वर्पः) रूप को (ध्वसयन्तः) विनाश करते हुए से (करिक्रतः) अत्यन्त कार्य करनेवाले जन (वृथा) मिथ्या (प्रेरते) प्रेरणा करते हैं (ते) वे (अस्य) इस मोक्ष की प्राप्ति को नहीं योग्य हैं जो (महीम्) बड़ी (अवनिम्) पृथिवी को (अभि, मर्मृशत्) सब ओर से अत्यन्त सहता (अभिश्वसन्) सब ओर से श्वास लेता (नानदत्) अत्यन्त बोलता और (स्तनयन्) बिजुली के समान गर्जना करता हुआ अच्छे गुणों को (सीम्) सब ओर से (एति) प्राप्त होता है (आत्) इसके अनन्तर वह मुक्ति को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥

भावार्थ : जो मनुष्य इस संसार में शरीर का आश्रय कर अधर्म करते हैं, वे दृढ़ बन्धन को पाते हैं और जो शास्त्रों को पढ़, योगाभ्यास कर, धर्म का अनुष्ठान करते, उन्हीं की मुक्ति होती है ॥ ५ ॥