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Rigveda / 7 / 61 / 7

इ॒यं दे॑व पु॒रोहि॑तिर्यु॒वभ्यां॑ य॒ज्ञेषु॑ मित्रावरुणावकारि । विश्वा॑नि दु॒र्गा पि॑पृतं ति॒रो नो॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒: सदा॑ नः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 61 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मित्रावरुणौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : इ॒यम् । दे॒व॒ । पु॒रःऽहि॑तिः । यु॒वऽभ्या॑म् । य॒ज्ञेषु॑ । मि॒त्रा॒व॒रु॒णौ॒ । अ॒का॒रि॒ । विश्वा॑नि । दुः॒ऽगा । पि॒पृ॒त॒म् । ति॒रः । नः॒ । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥ ७.६१.७

पदार्थ : (मित्रावरुणौ, युवभ्याम्) अध्यापक और उपदेशक आप दोनों (यज्ञेषु) यज्ञों में (इयम्, देव, पुरोहितिः) सब विद्वानों के हित करनेवाली वाणी (अकारि) कथन करें और (नः) हमारी (विश्वानि, दुर्गा) सब प्रकार की विषमता को (तिरः) तिरस्कार करके (पिपृतम्) नष्ट करें, (यूयम्) आप लोग (नः) हमको (सदा) नित्यप्रति (स्वस्तिभिः) अपनी मङ्गलप्रद वाणियों से (पात) कल्याणदायक उपदेश करते रहें ॥७॥

भावार्थ : परमात्मा उपदेश करते हैं कि कर्म, उपासना तथा ज्ञान इन तीनों प्रकार के यज्ञों में अध्यापक तथा उपदेशक ही पुरोहित का कार्य्य करते और यही जनता=जनसमूह को सब विघ्नों से बचाकर उसकी रक्षा करते हैं, इसलिये जनता को समष्टिरूप से इनसे स्वस्ति की प्रार्थना करनी चाहिये ॥७॥३॥ इकसठ ६१ वाँ सूक्त समाप्त हुआ ॥