Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 69 / 5

यो ह॒ स्य वां॑ रथिरा॒ वस्त॑ उ॒स्रा रथो॑ युजा॒नः प॑रि॒याति॑ व॒र्तिः । तेन॑ न॒: शं योरु॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ॒ न्य॑श्विना वहतं य॒ज्ञे अ॒स्मिन् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 69 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अश्विनौ | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यः । ह॒ । स्यः । वा॒म् । र॒थि॒रा॒ । वस्ते॑ । उ॒स्राः । रथः॑ । यु॒जा॒नः । प॒रि॒ऽयाति॑ । व॒र्तिः । तेन॑ । नः॒ । शम् । योः । उ॒षसः॑ । विऽउ॑ष्टौ । नि । अ॒श्वि॒ना॒ । व॒ह॒त॒म् । य॒ज्ञे । अ॒स्मिन् ॥ ७.६९.५

पदार्थ : (अश्विना) हे शूरवीर राजपुरुषो ! (वां) तुम (ह) निश्चय करके (अस्मिन्, यज्ञे) इस यज्ञ में (नि) निरन्तर (शंयोः) सुख को (वहतं) प्राप्त होओ (तेन) उस यज्ञ से (नः) हमको (उसषः, व्युष्टौ) प्रातःकाल उद्बोधन करो और (यः) जो (रथिरा) रथी=आत्मा रथ से (वस्ते) आच्छादित है, (स्यः) वह (रथः, युजानः) रथ के साथ जुड़ा हुआ (उस्रा) तेजस्वी बन कर (वर्तिः, परियाति) तुम्हारे मार्गों को सुगम करे ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में परमात्मा आज्ञा देते हैं कि हे शूरवीर राजपुरुषो ! तुम क्षात्रधर्मरूप यज्ञ को भले प्रकार पालन करते हुए सुख को प्राप्त होओ अर्थात् अपने उस रथीरूप आत्मा को, जिसका वर्णन पीछे कर आये हैं, यम नियमादि द्वारा तेजस्वी बनाओ और सब प्रजा को उद्बोधन करो कि वे प्रातः उषाकाल में उठकर अपने कर्तव्य का पालन करें। यदि तुम इस प्रकार संस्कृत आत्मा द्वारा संसार की यात्रा करोगे, तो तुम्हारे लिए सब मार्ग सुगम हो जावेंगे, जिससे तुम द्युलोक के अन्त तक पहुँच कर मुझे प्राप्त होगे ॥५॥