Rigveda / 1 / 142 / 4
ई॒ळि॒तो अ॑ग्न॒ आ व॒हेन्द्रं॑ चि॒त्रमि॒ह प्रि॒यम्। इ॒यं हि त्वा॑ म॒तिर्ममाच्छा॑ सुजिह्व व॒च्यते॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 142 | Mantra No : 4
In English:
Seer : diirghatamaa auchathyaH | Devta : agniH | Metre : svaraaDanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation Under Process
Verse : iiLito agna aa vahendra.m chitramiha priyam. iya.m hi tvaa matirmamaachChaa sujihva vachyate .
Component Words : iiLitaH. agne. aa. vaha. indram. chitram. iha. priyam. iyam. hi. tvaa. matiH. mama. achCha. su.ajihva. vachyate . 1.142.4
In Hindi:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : ई॒ळि॒तः। अ॒ग्ने॒। आ। व॒ह॒। इन्द्र॑म्। चि॒त्रम्। इ॒ह। प्रि॒यम्। इ॒यम्। हि। त्वा॒। म॒तिः। मम॑। अच्छ॑। सु॒ऽजि॒ह्व॒। व॒च्यते॑ ॥ १.१४२.४
पदार्थ : हे (सुजिह्व) मधुरभाषिणी जिह्वावाले (अग्ने) सूर्य के समान प्रकाशस्वरूप विद्वान् ! (ईडितः) प्रशंसा को प्राप्त हुए आप (इह) इस जन्म में (प्रियम्) प्रीति करनेवाले (चित्रम्) चित्र विचित्र नानाप्रकार के (इन्द्रम्) परमैश्वर्य को (आ, वह) प्राप्त करो जो (मम) मेरी (इयम्) यह (मतिः) प्रज्ञा बुद्धि तुम से (अच्छ) (वच्यते) कही जाती है (हि) वही (त्वा) आपको प्राप्त हो ॥ ४ ॥
भावार्थ : सबको पुरुषार्थ से विद्वानों की बुद्धि पाकर महान् ऐश्वर्य का अच्छा संग्रह करना चाहिये ॥ ४ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : दीर्घतमा औचथ्यः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ।
पदपाठ : ई॒ळि॒तः। अ॒ग्ने॒। आ। व॒ह॒। इन्द्र॑म्। चि॒त्रम्। इ॒ह। प्रि॒यम्। इ॒यम्। हि। त्वा॒। म॒तिः। मम॑। अच्छ॑। सु॒ऽजि॒ह्व॒। व॒च्यते॑ ॥ १.१४२.४
पदार्थ : (ईळितः) प्रशंसितः (अग्ने) सूर्यइव प्रकाशात्मन् (आ) (वह) (इन्द्रम्) परमैश्वर्यम् (चित्रम्) नानाविधम् (इह) अस्मिन् जन्मनि (प्रियम्) प्रीतिकरम् (इयम्) (हि) किल (त्वा) (मतिः) प्रज्ञा (मम) (अच्छ) (सुजिह्व) शोभना जिह्वा मधुरभाषिणी यस्य तत्सम्बुद्धौ (वच्यते) उच्यते ॥ ४ ॥
अन्वय : हे सुजिह्वाऽग्ने ईळितस्त्वमिव प्रियं चित्रमिन्द्रमावह या ममेयं मतिस्त्वयाच्छ वच्यते सा हि त्वा प्राप्नोतु ॥ ४ ॥
भावार्थ : सर्वैः पुरुषार्थेन विद्वत्प्रज्ञां प्राप्य महदैश्वर्यं संचेतव्यम् ॥ ४ ॥